रोपाई
रोपाई के लिए सदैव चार से पाँच पत्ती अवस्था पर या जब वे लगभग 15-20 सेमी0 ऊँची हो जाती है, स्वस्थ पा पौधों का प्रयोग करना चाहिए। यथा संभव देरी से रोपाई से बचना चाहिए क्योंकि यह खराब दोजियाँ निकलने मुख्य दोजियों का जल्दी पुश्पन होता है जिसके फलस्वरूप उपज में कमी हो जाती है। क्षारीय मृदाओं (ऊसर मिट्टियों) में 45 दिन की आयु की पौदों की रोपाई की जानी चाहिए क्योंकि पुरानी पौदें 25 दिन आयु की छोटी पौदों की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह से स्थापित होती हैं। रोपाई या तो हाथ द्वारा या यांत्रिक प्ररोपक (ट्रांसप्लान्टर) द्वारा की जाती है।
अंतराल
अच्छे प्रबंधन और पर्याप्त नाइट्रोजन स्तरों के अंतर्गत अनुकूलतम अंतराल (पौधे के बीज दूरी) लगभग 20x10 वर्ग सेमी0 होनी चाहिए। उत्ताम कृशि प्रक्रियाओं के साथ अंतराल थोड़ा सा अधिक चौडे, कहिए 20x15 वर्ग सेमी0 हो सकता है परन्तु अवसामान्य दषाओं के अंतर्गत अंतराल (दूरी) थोड़ा - सा अधिक संकुचित अर्थात् 15x10 वर्ग सेमी0 होना चाहिए।
पौदों की संख्या प्रति हिल (पिंडलक)
सामान्य दषाओं के अंतर्गत दो या तीन पौदे प्रति हिल (पिंडलक) की रोपाई प्रर्याप्त होती है। अधिक पौद प्रति हिल का उपयोग करने पर कोई अतिरिक्त लाभ न होने को छोड़कर पौधें पर अतिरिक्त व्यय सम्मिलित होता है। अधिक आयु की पौदों की रोपाई की स्थिति में पौदों की संख्या प्रति हिल बढ़ाई जा सकती है।
रोपाई की गहराई और पंक्तियों की दिषा : उथली रोपाईयों की स्थिति में आधारी गाँठ पर उत्पन्न दोजी कलिकाएं नहीं दबती है। इसलिए पौदों की रोपाई 2 से 3 सेमी0 की गहराई पर की जानी चाहिए।
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