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पर्णच्छद अंगमारी (Sheath Blight) |
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कारक जीव: राइजोक्टोनिया सोलेनी (Rhizoctonia solani) |
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विवरण: धान का यह रोग भारतवर्ष के विभिन्न भागों में तथा विशेषकर बौनी किस्मों पर पाया जाता है अर्थात फसल निवेश के उच्च स्तर पर रोग संक्रमण की संभावनाएं अधिक होती हैं ।इस कवक से अन्य फसलें जैसे अरहर, सें, मक्का, ज्वार, एवं मूंग आदि भी प्रभावित होती हैं । यही नहीं घास वाले खरपतवारों एवं जल कुम्भी पर भी यह संक्रमण करता है और खेत में धान की फसल न होने पर भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है । |
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लक्षण:प्रायः रोग का आक्रमण बालियाँ निकलते समय होता है । पानी अथवा भूमि की सतह के पास पर्णच्छ पर रोग के प्रमुख लक्षण प्रकट होते है । पर्णच्छद पर २ या ३ सें.मी.लम्बे हरे भूरे क्षतस्थल बनते हैं, जो बाद में पुआल के रंग के हो जाते हैं । यह धब्बा भूरी या बैंगनी भूरी पतली पट्टी से घिरा रहता है । बाद में ये क्षतस्थल बढ़कर तने को चारो ओर से घेर लेता है । अनुकूल वातावरण में क्षतस्थलों पर कवक जाल स्पष्ट दिखते है, जिन पर चार मि.मी. लम्बे अर्ध अथवा पूर्ण गोलाकार भूरे काले रंग के स्कलेरोशिया बनते हैं । पत्तियों पर क्षतस्थल असमान आकृति में होते हैं । दत्त (१९८६) ने रोग ग्राही किस्मों का चुनाव, अधिक आयु की पौद, कम अवधि की किस्में, अगेती एवं सघन रोपाई, नाइट्रोजन का उच्च स्तर, पछली फसलों के अवशेषों की उपस्थिति तथा सापेक्ष आर्द्रता >90 प्रतिशत, तापमान 250o से 30o से. आदि कारकों को रोग वृद्धि के लिए उत्तरदायी पाया । अधिक एवं लम्बी अवधि तक ओंस गिरना भी इस रोग के विस्तार में सहायक है । |
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नियंत्रण: |
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