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बदरा (Blast) |
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कारक जीव: पिरीकुलेरिया ग्रीस्या (Pyricularia Grisea) |
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विवरण: यह रोग धान उगाने वाले सभी देशों में पाया जाता है एवं पौध संरक्षण कार्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान रखता है । भारत में बटलर (१९१३) ने सर्वप्रथम इस रोग को धान की फसल पर देखा । नीची भूमियों की तुलना में शुष्क परिस्थितियों में इसका प्रकोप ज्यादा होता है । अनुकूल वातावरण में यह रोग फसल को पूर्णतः नष्ट कर सकता है । साधारणतः इससे १५-२०% की उपज में कमी होती देखी गई है । (देवदत्त, १९९६) ने अपने अध्ययन में सम्मिलित भू-भागों पर १० से ४५% की उपज में हानि अनुमानित की । दोदान आदि (१९८७) ने हरियाणा के पूर्वी क्षेत्रों में ग्रीवा-बदरा का प्रकोप २०-७०% अंकित किया, जिससे बासमती धान की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । यह रोग पिरीकुलेरिया ग्रीस्या (Pyricularia Grisea) माइसीलियम(Mycellium) द्वारा होता है । पहले इस कवक को पि. ओराइजी कहते थे । रोग -जनक के कवकजाल एवं कोनिडियम (Conidium) मौसम के अनुसार लम्बी अवधि तक जीवित रह सकते हैं । इनके सूखे पुआल में १ वर्ष तक तथा गांठ पर २ वर्षो तक जीवित रहने की फसल पर जाता है तथा रोग फैलाता है । अशुयामा (१९६५) ने कई प्रकार की घासों को बदरा रोग जनक कवक के प्रति सुग्राही पाया । दक्षिणी भारत में लगातार धान उगाने से, रोग का निवेश-द्रव्य एक फसल से दूसरी पर आसानी से स्थानांतरित हो जाता है । एक बार लक्षण उत्पन्न होने पर, इन विक्षतों से कवक के कोनिडियम अनुकूल वातावरण में अधिक मात्रा में बनते हैं तथा वायु द्वारा तेजी से फैलते हैं । बीज, पुआल तथा सिंचाई की नालियों से भी कवक कोनिडिया रोग का संचरण करते हैं । |
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लक्षण:रोग के विशेष लक्षण पत्तियों पर दिखाई देते हैं, परन्तु पर्णच्छद, पुष्पगुच्छ, गाठों तथा दाने के छिलके पर भी इसका आक्रमण पाया गया हैं, परन्तु कवक का स्पष्ट रूप से तीन अंगों पर अधिक संक्रमण होता है, इसी आधार परक उन्हें संबन्धित नाम से जाना जाता है । ये अंग है पत्ती, गांठ एवं ग्रीवा । पत्ती -बदरा पौद अवस्था से फूल आने तक रोगग्राही किस्मों में पाया जाता है । पत्तियों पर छोटा धब्बा बनता है, जो बढ़कर कई सेंटीमीटर लम्बा तथा लगभग १ सें.मी. चौड़ा कजराई आंखों के समान दिखाई देता है । क्षतस्थल के बीच का भाग धूसर रंग तथा परिधि पर गहरे भूरे रंग की पतली पट्टी दिखाई देती है । रोग ग्रसित पत्ती पर क्षतस्थल एवं स्वस्थ पत्ती को तुलनात्मक दृष्टि से दिखाया गया है, जिससे खेत में रोग आसानी से पहचाना जा सके । अनुकूल वातावरण में कई क्षतस्थल बढ़कर आपस में मिल जाते हैं, परिणामस्वरूप पत्तियां झुलसकर सूख जाती है । पौद की पत्ती सूखने की विभिन्न अवस्थाएं दर्शायी गई हैं । दौजी की गांठों पर कवक के आक्रमण से भूरे धब्बे बनते हैं, जो गांठ को चारो ओर से घेर लेते हैं, प्रायः दौजी यहाँ से टूट जाती है । पुष्प गुच्छ के निचले डंठल में जब रोग का संक्रमण होता है, तब बालियों में दाने नहीं होते तथा पुष्प गुच्छ सफेद सा हो जाता है और ग्रीवा काले से रंग की हो जाती है । परागण क्रिया के बाद रोग का प्रकोप होने पर दानों के भार में काफी कमी आ जाती है तथा खाली दानों की संख्या बढ़ जाती है । बदरा रोग से ग्रसित एवं तना छेदक से प्रभावित बालियां दर्शायी गई हैं । बदरा रोग ग्रस्त बाली पर नीचे की ओर क्षतस्थल स्पष्ट दीखते हैं, जबकि दूसरी बाली में यह भाग समान्य है, अतः धान के खेत में स्पष्टरूप से दोनों प्रकार की क्षतिग्रसत बालियां पहचानी जा सकती हैं ।
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पत्ती बदरा गांठ बदरा ग्रीवा बदरा |
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नियंत्रण:
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