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बेबीकार्न की उत्पादन तकनीक

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बेबीकार्न की उत्पादन तकनीक

अमित भटनागर
गो0ब0पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पन्तनगर,

मृदा

     बेबीकार्न को लगभग सभी प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है परन्तु दोमट या सिल्ट दोमट मृदा जिसमें जल निकास की अच्छी सुविधा हो, इसके लिए सर्वोत्तम होती है। मृदा में जैवांश पदार्थो की मात्रा अधिक होनी चाहिए। मृदा का पी0एच0 मान 6.5 से 7.5 होना अच्छा रहता है। बेबीकार्न को ऊँचे खेतों में बोना चाहिए ताकि खेत में जल भराव की स्थिति उत्पन्न न हो।

खेत की तैयारी

     बेबीकार्न के लिए खेत को भली-भांति तैयार करके समतल कर लेना चाहिए। खेत को किसी मिट्टी पलटने वाले हल से एक बार गहरा जोतने के बाद तीन-चार देशी हल या हैरो चलाकर खेत को बुवाई के योग्य कर लेना चाहिए।

किस्मों का चयन

     बेबीकार्न के लिए कम अवधि एवं मध्यम ऊँचाई वाली किस्मों को उगाना चाहिए जिनमें एक से अधिक भुट्टे आते हों। बेबीकार्न के लिए सस्तुत किस्में वी0एल0 78, एच0एम0 4, प्रकाश, पूसा अगेती संकर मक्का-3, 4 एवं 5 है।

बुवाई का समय

     बेबीकार्न उत्तरी एवं पूर्वी राज्यों में फरवरी से सितम्बर के बीच कभी भी बोयी जा सकती है जबकि पश्चिमी एवं दक्षिणी राज्यों में इसे वर्ष भर बो सकते है।


बीज की मात्रा

     सामान्यत: एक हैक्टेअर क्षेत्र के लिए 40 किलाग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बीज से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व बीज को बेविस्टीन नामक दवा से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए।


बुवाई की विधि

     बेबीकार्न को मेडों पर बोना चाहिए। इससे पौधे की वृध्दि अच्छी होती है तथा खेत में जल निकास की व्यवस्था भी हो जाती है। इसके अतिरिक्त मेड पर बोने से पौधे पोषक तत्व को अधिक मात्रा में ग्रहण करते है तथा पौधों के गिरने की समस्या भी कम हो जाती है।

बुवाई की दूरी

     बेबीकार्न के लिए सामान्य मक्का की अपेक्षा 70 प्रतिशत अधिक पौधों की आवश्यकता होती है। इसके लिए पौधों की संख्या 110000-125000 प्रति हैक्टेअर रखनी चाहिए। उपरोक्त पौधों की संख्या प्राप्त करने के लिए मेड से मेड की दूरी 45 से 60 सेमी0 तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेमी0 रखी जाती है।


उर्वरको की मात्रा

     उर्वरको के प्रयोग से पहले मिट्टी की जाँच अवश्य करवा लेनी चाहिए। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए बुवाई से पूर्व अन्तिम जुताई के समय सडी हुई गोबर की खाद 8-10 टन प्रति हैक्टेअर की दर से खेत में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। चूँकि बेबीकार्न में पौधों की संख्या सामान्य मक्का की अपेक्षा अधिक होती है इसलिए इसमें अधिक उर्वरकों का प्रयोग करते है। बेबीकार्न के लिए 150 कि0ग्रा0 नाइट्रोजन, 60 कि0ग्रा0 फास्फोरस एवं 60 कि0ग्रा0 पोटाश प्रति हैक्टेअर आवश्यकता होती है। खेत में जिंक की कमी होने पर 25 कि0ग्रा0 जिंक सल्फेट प्रति हैक्टेअर की दर से प्रयोग करना चाहिए। उर्वरकों को प्रयोग करने का समय इसके बोने की ऋतु पर निर्भर करता है जो निमन प्रकार से है:

अ. खरीफ ऋतु में

  • 1/3 भाग नाइट्रोजन एवं फास्फोरस व पोटाश की पुरी मात्रा - बुवाई के समय
  • 1/3 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 25 दिन बाद
  • 1/3 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 40 दिन बाद

ब. रबी ऋतु में

  • 1/4 भाग नाइट्रोजन एवं फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा - बुवाई के समय
  • 1/4 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 30-35 दिन बाद
  • 1/4 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 60-80 दिन बाद
  • 1/4 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 80-110 दिन बाद

स. बसन्त ऋतु में

  • 1/4 भाग नाइट्रोजन एवं फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा - बुवाई के समय
  • 1/4 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 25 दिन बाद
  • 1/4 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 40-45 दिन बाद
  • 1/4 भाग नाइट्रोजन - बुवाई के 60-65 दिन बाद

खरपतवार नियंत्रण

     बुवाई के 15 दिन बाद एक निराई-गुडाई अवश्य कर देनी चाहिए। इससे खरपतवार नष्ट हो जाते है। इसी समय आवश्यकता से अधिक पौधों को उखाडकर पौधों के बीच की दूरी 15 से 20 सेण्टीमीटर कर देनी चाहिए। दूसरी निराई-गुडाई, बुवाई के 30-35 दिन बाद करनी चाहिए। यदि निराई-गुडाई का प्रबन्ध नही हो पाता है तो रासायनिक दवाओं को प्रयोग करना चाहिए। बुवाई के लगभग 2-3 दिन के बाद एट्राजीन की 2 कि0ग्रा0 मात्रा को 700-800 लीटर पानी मे घोलकर एक हैक्टेअर क्षेत्र में छिडकाव करना चाहिए। यदि एट्राजीन दवा उपलब्ध न हो तो एलाक्लोर 5 लीटर या पेन्डीमैथालिन 3.33 लीटर हैक्टेअर दवा को छिडकना चाहिए।

जल प्रबन्ध

     बेबीकार्न के लिए 2 से 3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई - बुवाई के 20 दिन बाद, दूसरी सिंचाई - बुवाई के 30 से 35 दिन बाद जब फसल की ऊँचाई घुटनों तक हो जाये, तथा तीसरी सिंचाई - नर मंजरी निकलने समय करनी चाहिए। खेत मे जल निकास की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए अन्यथा पानी भरने पर फसल को काफी नुकसान होता है।

नर मंजरी (झण्डे) को तोडना

     बेबीकार्न अनिषेचित भुट्टा होता है अत: इसके निषचन से बचाव के लिए नर मंजरियों को निकलते समय ही तोड देना चाहिए। इन नर मंजरियों को पशुओं को खिला देना चाहिए। बेबीकार्न में नरमंजरियों को तोडना एक अति आवश्यक क्रिया है अन्यथा भुट्टों में निशेचन होकर बीज बन सकता है। नरमंजरियों को तोडते समय यह घ्यान रखें कि पौधें ना टूटें।

रोग व कीट नियंत्रण

     बेबीकार्न में रोग व कीट बहुत कम लगते है। रोगों से बचाव हेतु बीज को बेविस्टीन दवा से उपचारित करके बोना चाहिए। झुलसा रोग (पत्तियों पर अण्डाकार पीले भूरे रंग के धब्बे) होने पर इंडोफिल एम-45 दवा का 0.25 प्रतिशत का छिडकाव करना चाहिए। तना भेदक कीट का प्रकोप होने पर 700 लीटर पानी में घोलकर एक हैक्टेअर क्षेत्र में छिडाकाव करना चाहिए।

बेबीकार्न की तुड़ाई

     अच्छी गुणवत्ता के बेबीकार्न हेतु भुट्टों को निकलने के 2 से 3 दिन के अन्दर ही तोड लेना चाहिए। भुट्टो (गुल्ली) में रेशमी कोपलें 3 से 4 सेण्टीमीटर लम्बी हों पर तुडाई कर लेनी चाहिए। भुट्टे तोडते समय उनके ऊपर की पत्तियां नही हटानी चाहिए अन्यथा ये जल्दी खराब हो जाती है। बेबीकार्न में 3 से 4 तुडाई करनी चाहिए। खरीफ ऋतु में प्रतिदिन एवं रबी ऋतु में प्रत्येक दूसरे दिन तुडाई आवश्यक होती है। तुडाई इस प्रकार करनी चाहिए कि पौधे ना टूटें।

उपज

     बेबीकार्न की उपज लगभग 30-35 कुन्टल/हैक्टेअर होती है इसके अतिरिक्त 200-400 कुन्टल/हैक्टेअर हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है।

तुड़ाई के बाद प्रबन्ध

     बेबीकार्न का छिलका ठण्डे छाया एवं हवादार स्थानों पर निकलना चाहिए। छिलका उतरे हुए बेबीकार्न को ढेर लगाकर नही रखना चाहिए। बल्कि प्लास्टिक की टोकरी, थैले या अन्य किसी बैेग में रखना चाहिए। इसके तुरन्त बाद इसे संसाधन इकाइ या मण्डी में पहुँचा देना चाहिए। इसके तुरन्त बाद इसे संसाधन इकाई या मण्डी में पहुँचा देना चाहिए।





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