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भूरी चित्ती (Brown Spot) |
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कारक: हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराईज़ी (Helminthosporium oryzae, Breda de Haan) विवरण: यह रोग पौधे के जीवन की सभी अवस्थाओं पर संक्रमण करता है । पोटाश का असंतुलन अथवा कमी वाले क्षेत्रों, क्षारीय भूमियों तथा नाइट्रोजन के निम्न स्तर पर पौधों में रोग-ग्राहिता बढ़ जाती है । कवक-जाल तथा कोनिडियम दोनों ही प्रतिकूल अवस्था में काफी दिनों तक जीवित रह सकते हैं । अतः कवक रोगी-पौधों के अवशेषों एवं बीजों पर जीवित रहता है । कोनिडियम के दोनों ओर से जनन नलिका (Germ Tube) निकलती है, जिसमें से पुनः एक पतली संक्रमण नलिका निकलती है, जो सीधे उप त्वचा (Cuticle) तथा बाह्यः त्वचा (Epidermis) को बेधती है । जनन नलिका सीधे रध्रों द्वारा भी पत्तियों में प्रविष्ट हो सकती है तथा २४ घंटे के अन्दर लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं । |
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लक्षण: |
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नियंत्रण IET 13171 IET 7613/VL 12 IET 13621 Heera/Lakhi IET 13712 Saket/UPR 759-20-17 IET 13619 Tulasi/ARC 10372 इनमें से एक या एक से अधिक सन्ततियों की अन्य गुणों में उपयुक्त पाए जाने पर रोग ग्रस्त क्षेत्रों में उगाने हेतु संस्तुती की जा सकती हैं । इसके अतिरिक्त किस्म जी एस ५३१, मोंरगक्यान (Morangkayan) ,सुव्योन (Suwean339), ताईचुन सेन (Taichung Sen), अकियुडाका (Akiyudaka), टी-टीप (Te tep), शिमोकिटा (Shimokita) एवं आई.आर.६४ को संकरण कार्य में रोग निरोधक दाता के रूप में प्रजनन कार्य हेतु उपयोग किया जा सकता है (डी.आर.आर. १९९५ए)। कौर आदि (१९७९) ने पाया कि मैग्नीशियम सल्फेट का १० पी.पी.एम. और फैरिक क्लोराइड का २.५ पी.पी.एम. घोल से जड़ों के उपचार करने पर भूरी चित्ती रोग के संक्रमण में सार्थक गिरावट होती है। रोग नियंत्रण हेतु सुझाव निम्न हैः
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