Submitted by shuklarajeew on Fri, 03/07/2009 - 17:30
रबी फसलों की उत्पादकता बढाने के लिए मुख्य सुझाव
राजीव कुमार
गो0ब0पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पन्तनगर,
1. गेहूँ
- भूसा/पुआल को जलाने के बजाए उपयोग में लाना।
- शून्य परिष्करण/कर्षण या सीधी बुवाई करना।
- जीरो टिल कम फर्टी सीड ड्रिल(बुवाई मशीन) को उपयोग में लाना।
- फर्ब्स (फरो इरिगेटेड रेज्.ड बेड प्लान्टिंग) : जल की कमी वाले क्षेत्रो में रोपाई एवं अन्य प्रबन्धन नीतियों को अपनाना।
- उत्तर पश्चिमीय एवं मैदानी क्षेत्रों में जिंक सल्फेट एवं सल्फर का उपयोग करना।
2. बोरो धान
- खेतो पर जल प्रबन्धन योजना को अपनाना।
- असम के उथने टयूबल मॉडल को स्थान-स्थान पर लगाना।
- क्षेत्रफल के अनुसार एकीकृत पोषक ततवो के प्रबन्धन के साथ उपयुक्त किस्मों का चयन करना।
- रबी फसल में जल संरक्षण के लिए धान सधनता तन्त्र को अपनाना।
3. ज्वार
- सिंचित क्षेत्रो में भारी मृदा के लिए सी0एस0एच015आर0 और सी0एस0एच015आर0 संकर बीजों को अपनाना।
- रबी फसल के लिए उन्नत किस्मों को प्रभावित करनां
- तना मक्ख्ी के नुकसान से बचाव के लिए शीघ्र बुवाई करना।
4. गन्ना
- सिंचाई क्षमता को बढावा देने के लिए बूँद-बूँद सिंचाई तन्त्रा का उपयोग करना।
- वुली एफिस के नियंत्रण के लिए जैव उर्वरकों एवं जैव नियंत्रको का उपयोग करना।
- कमी वाले क्षेत्रों में सूक्ष्म पोषक तत्वों (मुख्यत: लौह, जिंक एवं गन्धक) का प्रयोग करना।
- युग्मित कतार बुवाई को बढावा देना।
5. रबी दलहनें
- मध्य भारत में चना, मसूर के साथ ज्वार, कुसुम का अन्तर्सस्यन करना।
- छत्तीसगढ, झारखण्ड, प0बंगाल, उडीसा,, पूर्वीय मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश के कुछ भागों एवं कर्नाटक के बहुत बडे क्षेत्रफल में धान परती के स्थान पर निम्न अवधि वाले चना/मसूर को लिया जा सकता है।
- खेतों पर नम बीज शोधन करना।
- न्यूनतम कर्षण का उपयोग करना।
- बीज में राइजोबियम जीवाणुओं के 5 ग्रा0/कि0ग्रा0 की मात्रा से मिलाना। नत्रजन ग्रन्थियों को बढावा देने के लिए मॉलिब्डिनम की सूक्ष्म मात्रा का प्रयोग करना (सोडियम मालिस्डेट को मृदा में 9200 ग्रा0/है0 की मात्रा से मिलाना या 0.5 ग्रा./लीटर की मात्रा से नम बीज शोधन करना।
- धान परती में उर्द/मूँग की फसल को अपनाना।
6. रबी तिलहनें
- कुसुम में पौधों को उगने के पूर्व एवं पश्चात् मरने से बचाने के लिए फफूँदनाशक रसायनों से बीज उपचार करना।
- उपलब्धता के अनुसार क्रमिक कुंड तंत्र को अपनाना।
- राई व सरसों एवं चने के साथ अलसी का अन्तर्सस्यन करना।
- शूलरहित किस्में जैसे कि एन0ए0आर0आई06 एवं एम0के01 को उपयोग करने के लिए बढावा देना।
- राई व सरसो में एस0आर0आर0 को 60 प्रतिशत तक बढाना।
- राई व सरसो में एकीकृत पोषक तत्वों के साथ गन्धक (जिप्सम) एवं फास्फोरस घुलनशील जीवाणुओं को महत्व देना।
- ग्रीष्मकानीन धान के स्थान पर मूँगफानी की फसल लेना।
7. सामान्य मूद्दे
- फसलों को उगाने के लिए मेड, नाली एवं ब्रॉड बैड्स (Broad beds) का उपयोग करना।
- पौधों के मरने से बचाने के लिए बीज उपचारण को बढावा देना।
- असम, उत्तर पश्चिमी प्रदेश, प0 बंगाल, उडीसा, बिहार, झारखण्ड, केरल, महाराष्ट्र एवं हिमाचल प्रदेश में लगभग 100 मिलियन हैक्टयर अम्लीय मृदा है जिसमें से 25 मिलियन हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि का pH 5.5 से भी कम है। इसलिए ऐसी मृदा में लगभग 25 प्रतिशत कैल्शियम आक्साइड (बेसिक स्लैग, चूना स्लज, कैल्साइट, डोलोमाइट, जिप्सम व िप्रेस मड) का प्रयोग आवश्यक है।
8. सुझाव
- क्षेत्रीय असंतुलता एवं आय विभिन्नता को कृषि के द्वारा कम करना।
- द्वितीय हरित क्रान्ति को लाना (जैसे समान क्षेत्रफल में चीन भारत की तुलना में अनाजों की लगभग दुगुनी पैदावार करता है।)
- भारत, उत्पादकता में धान में सत्ताइसवें स्थान पर गेहूँ में बत्तीसवें स्थान पर तथा सोयाबीन एवं आलू में तैंतीसवें स्थान पर है।
- सभी 13 पोषक तत्वों के लिए मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं को स्थापित करने की आवश्यकता।
- भूमि तैयार करने लिए वैज्ञानिक आधारों को अपनाना।
- संतुलित एवं उचित मात्राओं में उर्वरको का प्रयोग करना।
- उत्तर पश्चिमीय कृषि समस्यायो का सूक्ष्म निरीक्षण करना।
- उत्पादकता लागत में कमी लाना।
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