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उदबत्ता (Udbatta)

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  उदबत्ता (Udbatta)

कारक जीव: इफेलिस ओराईज़ी (Ephelis oryzae)

विवरण: भारतवर्ष में यह रोग जम्मू कश्मीर, बिहार, उड़ीसा के पर्वतीय भाग, मैसूर तथा महाराष्ट्र में पाया जाता है ।उदबत्ता इफेलिस ओराईज़ी (Ephelis oryzae) कवक द्वारा होता है । आभासी स्कलेरोशियम के उपरी सतह पर पिक्निडिया (Pycnidia) बनते है, जो खुले रहते हैं । पहले ये भूरे, बाद में काले, नाखरूप होते हैं । कवक आंतरिक बीजोड है । अतः ऐसे रोगग्रस्त बीज बोने से कवक पौधों में सर्वागीं हो जाता है, जिससे रोग को बालियाँ निसरने से पहले नहीं पहचाना जा सकता है । ठंडी जलवायु कवक के जीवन चक्र को पूरा करने तथा पौधों पर संक्रमण बढ़ाने में सहायक होती है ।

लक्षण:
रोगी पौधों से सामान्य बालियों स्थान पर भूरापन लिए सफेद, सीधी बेलनाकार छड़ निकलती दिखाई देती है । पहले यह बन्ध्य पुष्पगुच्छ सफेद कवकजाल से ढकी रहती है और बाद में स्कलेरोशिया की तरह कड़ी हो जाती है । इस पर भूरे से काले बिंदुओं के समान मस्से (Warts) बने है । रोग -ग्रस्त बालियों में दाना नहीं बनता है । कभी-कभी ध्वज पत्ती के ऐंठन से भी रोग ग्रसित पौधा पहचाना जाता है ।

 

 

नियंत्रण:
मोहते (१९६४) ने सूर्य की धूप से बीज को उपचारित करने से रोग नियंत्रण में आशाजनक सफलता पाई । रोग रोधी किस्मों का चुनाव क्षेत्रीय स्तर पर किया जाता है । इसके अतिरिक्त बीज को ५० से ५४ डिग्री से. गर्म पानी में १० मिनट तक रखने से बीज में उपस्थित कवक को नष्ट किया जा सकता है ।

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