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गाल मक्खी

गाल मक्खी  (Gall Midge)

वैज्ञानिक नाम : ओरसोलिया  ओराइजी (Orseolia oryzae)

पहचान: कीट की नर मक्खी लगभग ३ मि.मी. लम्बी, पीली सी भूरे शरीर वाली तथा हल्के बालों वाले ऐटिना युक्त तथा लम्बे गहरे भूरे रंग की टांगो वाली होती है । जबकि मादा मक्खी का शरीर चमकदार भूरे लाल रंग का तथा ३.५ मि.मी. लम्बा होता हैं । ये रात्रिचर होते है तथा १ से ५ दिन जीवित रहते हैं । मादा मक्खी पत्ती के निचले भाग अथवा लिग्यूल के बालों पर ३ से ४ अंडो के गुच्छों में १०० से ३०० तक अंडे देती है । अंडे ०.५५ मि.मी. लम्बे नलिकार होते हैं, इनका रंग सफेद या गुलाबी लाल होता है, परन्तु हेचिंग (Hatcching) से पहले चमकदार कहरूवा (Amber) रंग के हो जाते हैं, इसमें ३ से ४ दिन का समय लगता है । मैगट से प्यूपा के लिए १५ से २० दिन लगते है, जबकि प्यूपा अवधि २ से ८ दिन की ही होती है ।

क्षति की प्रकृति: पौदशाला एवं दौजी अवस्थाओं में मक्खी के मैगट धान के पौधों को क्षति पहुंचते है (मक्खी का लारवा) रेंगकर पौधे के अग्रज भाग पर पहुंचते हैं एवं वृद्धि अग्रज को खा जाते हैं, साथ ही पर्णच्छद को भी अंदर से क्षति पहुँचाते हैं, जिससे यह खोखली और चमकदार सफेद नलिका का आकार ले लेती है, जिसे रजत शाखा (Silver Shoot) कहते है । वृद्धि अग्रज क्षतिग्रस्त  होने पर, दौजियाँ अधिक संख्या में निकलती हैं, जिन पर मैगट पुनः आक्रमण करते हैं, इस प्रकार कभी-कभी पूरी फसल ही बरबाद हो जाती है । उड़ीसा, म.प्र., तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक तथा बिहार में इस कीट से काफी क्षति होती है । जिस वर्ष वर्षा जल्दी आरम्भ हो जाती है, धान की फसल अधिक क्षतिग्रस्त होती है । कभी-कभी- पछेती बिजाई /रोपाई की गई फसल कीट से कम क्षतिग्रस्त होती है । क्योंकि ऐसी दशा में परजीवी, इनको नियंत्रित करते हैं । मस्टा (ई.क्रुसगेली) तथा जंगली धान (ओ.निवारा) इसके मुख्य परपोषी है, जो इसके जीवन यापन में सहयोगी हैं । इनकी उपस्थिति कीट-संक्रमण को बढावा देती है ।

 

नियंत्रण:

  • स्वच्छ खेती तथा आस पास का वातावरण खरतवार रहित करना ।
  • पूर्व फसल के अवशेषों को नष्ट करना (जलाना अथवा जुताई द्वारा गहरा दबाना) ।
  • सबसे प्रभावी नियंत्रण कदम कीटरोधी किस्म उगाना ही है । कुछ मुख्य कीटरोधी किस्मों में अभय, दया, रशमी, सरसा, शक्ति, कशिरा, नीला, फाल्गुना, विक्रमार्या, सुरेखा, सुरक्षा, तथा आई.आर. ३६ आदि हैं ।
  • दानेदार कीटनाशी कार्बोफ्यूरान-०.७५ कि.ग्रा.ए.आई./है. अथवा क्विनल्फास या फेंथिओन -१ कि.ग्रा.ए.आई./है. का प्रयोग करना चाहिए ।

 

 

 

 

 

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