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टुंग्रो (Tungro Virus)

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टुंग्रो (Tungro Virus)

कारक: टुंग्रो वाइरस (Rice Tungro Virus, RTV) 

विवरण: वर्ष १९६६ में प. बंगाल तथा २ वर्ष बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में इस रोग से काफी क्षति हुई । दक्षिण भारत में जहाँ धान की २ से ३ फसलें ली जाती हैं, वाइरस जीवित पौधों तथा उनके हरे डंठलों में रहता है, जबकि उत्तरी भारत में ये वाइरस कुछ घासों जैसे सावई, सांवा आदि पर रहता है । पिल्लई आदि (१९७८) ने अधिक नाइट्रोजन के स्तर पर इस रोग का अधिक संक्रमण पाया ।
यह वाइरस रोगी पौधों से स्वस्थ पौधों पर हरा तेला, (हरा माहू, Nephotettik impicticeps.Green leaf hopper) के नर, मादा, तथा निम्फ (Nymph) द्वारा संचारित (Transmit) होता है । जब हरा तेला (फुदका) रोग ग्रस्त पौधे की पत्तियाँ खाता है, उस समय वाइरस उसके मुख भाग (Stylets) से चिपक जाते हैं । पांच मिनट के इस खाने /खुरचने के बाद यह कीट वाइरस को स्वस्थ पौधे में संचारण करने योग्य हो जाता है । कीटो द्वारा बारम्बार यही क्रिया दोहराने से रोग शीघ्रता से फैलने लगता है । इस वाइरस के २ भाग (Particles ) अर्थात वैसीलीफोर्म (Bacillifrom, Rod Shaped) एवं स्फीरिकल (Spherical, Round Shaped) पाए जाते हैं । जिन पौधों में वैसीलीफार्म भाग पाया जाता है,नमें पत्तियों पर हल्का बदरंग (Discolouration) आता है, दौजी घटती है और बौनापन पाया जाता है, परन्तु हरा तेला इसको दूसरे पौधों में संचारित नहीं कर पाता । जिन पौधों में मात्र स्फीरिकल भाग पाया जाता है, उनमें रोग के लक्षण प्रकट नहीं होते, परन्तु कीट इस वाइरस के भाग को संचारित कर सकता है,  परन्तु जिन पौधों में दोनों भाग पाए जाते हैं, उनसे वाइरस लेकर जब हरा फुदका स्वस्थ पौधों में संचारित  करता है, तभी रोग के लक्षण प्रकट होते हैं । इस प्रकार रोग की गंभीरता वाइरस के उपस्थित भागों, हरा तेला की संख्या, वातावरण की अनुकूलता तथा पौधों की रोग ग्रहिता स्थिति के स्तर पर निर्भर करती है ।

लक्षण: वाइरस से ग्रस्त पौधे छोटे रह जाते हैं उनमें दौजियां कम निकलती हैं । रोग-ग्राही किस्मों की पत्तियों का रंग संतरे के रंग का या भूरा पीला हो जाता है, जबकि अपेक्षाकृत कम रोगग्राही किस्मों की पत्तियों का रंग हल्का पीला होता है । प्रारम्भ में संक्रमण होने पर पौधे छोटे रहेगें, जबकि, बाद के संक्रमण में पौधे की लम्बाई पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता । पत्तियों का बदरंगापन प्रायः सिरे से आरम्भ होकर नीचे की ओर बढ़ता है । रोग्रस्त पौधों की कोमल पत्तियों पर शिराओं के समानान्तर पीले हरे से लेकर सफेद रंग की धारिया बनती हैं । रोग ग्रस्त पौधों में बालियां देर से तथा छोटी निकलती हैं, जिनमें दाने नहीं होते अथवा बहुत हल्के होते हैं । दानों के ऊपर गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं ।

 

 

 

 

नियंत्रण:
आशाजनक रोग रोधी किस्में क्रमशः आई.ई.टी. १३६४८, १३७३२ तथा ११८६७ पाई गई (डी.आर.आर.१९९५ बी) । किस्म विक्रमार्या (Vikramarya) ,जो मध्यम अवधि की, लम्बा एवं मोटा दाना और अधिक उपज क्षमता वाली रोग रोधी किस्म है । ऐसी ही अन्य किस्में है अन्नपूर्णा, पूसा-३३, रत्ना, साकेत -४, हीरा, आई.आर. ५०, जानकी, कशिरा (Kshira), त्रिवेणी, श्रीनिवास और मोती हैं । रोग नियंत्रँ हेतु निम्न उपाय अपनाएं:

  • केवल रोग रोधी किस्में ही उगाएं ।
  • धान की कटाई के बाद डठलों तथा दौजियों को नष्ट कर दें और धान की पेडी (Ratoon) फसल न उगाएँ ।
  • पौदशाला में बिजाई से पूर्व ३० से ३५ कि.ग्रा. कार्बोफ्यूरान ३ जी. अथवा १२ से १५ कि.ग्रा. फोरेट १० जी प्रति हैक्टर ऊपरी २ से ३ सें.मी. मिट्टी में मिला दें । बिजाई के १५ से २५ दिन बाद मोनोक्रोटोफास ३६ ई.सी. अथवा कार्बेरिल ५० डब्ल्यू. पी. अथवा फोस्फेमिडोन ८५ डब्ल्यू. एस.सी.को०.५ कि.ग्रा.ए.आई. प्रति हैक्टर छिड़काव करें । इन उपायों से हरा तेला नियंत्रित किया जा सकेगा ।

प्रारम्भ में दिखाई देने वाले रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला दें, ऐसा करना संक्रमण का आधार समाप्त होने में सहायक होगा ।

 

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