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तना गलन (Stem rot)

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तना गलन (Stem rot)

कारक:  मैग्नापोर्थि सेल्विनी (Magnaporthe salvinii ) 

विवरण: यह दक्षिण पूर्वी एशिया के उन सभी क्षेत्रों में पाया जाता है, जहाँ धान की वर्ष भर लगातार खेती होती है । फसल की कटाई के बाद भी खेत में बचे हुए तने के भीतर स्कलेरोशियम पर्याप्त मात्रा में रहते हैं । ये प्रतिकूल वातावरण के लिए काफी सहनशील होते है और दूसरे वर्ष धान की रोपाई तक पौधे के अवशेषों में जीवित रहते हैं । वर्षा होने / पानी मिलने पर ये स्कलेरोशियम, पानी में तैरने लगते हैं और रोपे गये पौधों के पर्णच्छद के पास जाकर संक्रमण करते हैं । प्रायः रोग उन खेतों में अधिक होता है जहाँ पानी काफी समय तक ठहरता है तथा जहां जल निकास सुविधा अच्छी नहीं है । तना-छेदक कीट से ग्रस्त पौधे भी इस रोग के प्रति अधिक ग्राही हो जाते हैं ।

लक्षण
इस रोग का मुख्य लक्षण भूरे काले रंग के धब्बों के रूप में रोपाई के २-३ सप्ताह बाद तना तथा पर्णच्छद पर पानी की सतह के पास दिखने लगता है, जो कई सें.मी. तक ऊपर-नीचे फैल जाता है । रोगी पौधे के तने को चीरने पर कपासी-सलेटी रंग के कवक जाल में काले-काले स्कलेरोशियम पाए जाते हैं । कभी-कभी ये लक्षण निचली एक या दो पोरियों को छोड़कर ऊपर द्वितीयक संक्रमण से प्रकट होते हैं । जिन खेतों में पानी देर तक ठहरता हो, उनमें पर्णच्छद पर लकीरों में छोटे-छोटे काले पेरीथोसियम बनते हैं । तना सड़ जाता है, जो खींचने पर आसानी से टूट कर उखड़ जाता है । नीचे से २-३ गाठों पर या पानी से ऊपर आपस्थानिक जड़े भी निकलती हैं । तनागलन से रोग ग्रसित पौधे आसानी से गिर जाते हैं ।

 


 

नियंत्रण
नाइट्रोजन उर्वरक के साथ पोटाश उर्वरक देने से रोग-संक्रमण कम पाया गया है । सिंह आदि (१९८८) ने अपने अध्ययन में पाया कि कार्बेडांज़िम (Carbendazim) अथवा थायोफेनेटमिथायिल (Thiophanatemethyl) के 0.1 प्रतिशत घोल का २ बार अर्थात रोग लक्षण प्रकट होने के आरंम्भ तथा पुष्पन के समय फसल पर छिड़काव करने से रोग नियंत्रण में आ जाता है । मुख्य रूप से निम्न सस्य क्रियाएं लाभकारी होती हैं:

  • कटाई के बाद रोगग्रस्त फसल के अवशेषों को जला दें एवं ग्रीष्म में गहरी जुताई करें ।
  •  रोग-रोधी किस्म का चुनाव करें ।

 धान के खेत में अधिक समय तक पानी न ठहरने दें, समय-समय पर इसे निकालते रहें

 

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