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तलगलन एवं बकाने (Foot rot and Bakanae)

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तलगलन एवं बकाने (Foot rot and Bakanae)
कारक:  जिबरेला फयूजीकुरेई (Gibberella fujikurai)
विवरण:यह रोग भारतवर्ष में कहीं -कहीं पर पाया जाता है,जो जिबरेला फयूजीकुरेई (Gibberella fujikurai) की अपूर्णावस्था फयूजेरियम मौनिलिफार्मे (Fusariun moniliforme) से होता है । पौधों में जिब्रेलिक अम्ल (Gibberellic Acid) हारमोन की मात्रा बढ़ने के समान लक्षण प्रकट होते हैं अर्थात पौधा काफी लम्बा हो जाता है । यह मुख्यतः बीज -जनित रोग है, परन्तु मिट्टी द्वारा भी रोग का सक्रमण होते पाया गया । कवक पराग-कोश और वार्तिकाग्र (Stigma) में अंतराकोशिका (Intercellular) से होकर बढ़ता है और अंडाशय में पहुंच जाता है । पुष्प गुच्छ निकलने के कुछ दिनों बाद फूलों द्वारा संक्रमण नहीं होता । जब ऐसे रोगी बीज पौदशाला में बोये जाते हैं, तब कवक संर्वागी हो जाता है तथा बकाने के लक्षण परदर्शित करता है।रोग वृद्धि हेतु अनुकूलतम तापमान २५-३० डिग्री से.  पाया गया । रोग का प्रकोप बलुई दोमट मिट्टी में मटियार दोमट की अपेक्षा अधिक होता है ।
लक्षण
पौदशाला में पीले, पतले तथा असाधारण लम्बे पौधे स्वस्थ पौधों के साथ-साथ दिखाई देते हैं । रोग की उग्र दशा में ये पौधे रोपाई से पूर्व ही मर जाते है । रोपाई के बाद खेत में भी पौधे ऐसे ही पीले, पतले तथा लम्बे हो जाते हैं । रोगी पौधों की सभी दौजियां पीली हरी सी ही निकलती है।अधिकतर पौधे पुष्प गुच्छ निकलने एवं पकने से पहले ही मर जाते है।रोगी पौधों के निचले भागों पर बने कोनिडिया हवा द्वारा स्वस्थ पौधों के पुष्प पहुंचकर  फूलों पर संक्रमण करते हैं तथा रोगग्रस्त दाने बनते है, जो अंकुरण बाद रोग के लक्षण प्रकट करते हैं । चित्र- में इसी प्रकार के पतले लम्बे पौधे तथा मारता हुआ पौधा दर्शाया गया है । उच्च भूमि में धान के पौधों का बिना लम्बा हुए ही तलगलन/ पदगलन के लक्षण पाए गये है । दौजियाँ निकलने या बालियां आने के बाद नमी युक्त वातावरण में तने के निचले भागों पर सफेद से गुलाबी रंग का कवक दिखाई देता है, जो क्रमशः ऊपर की ओर बढ़ता है । मौसम के अन्त में निचले पर्णच्छद का रंग नीला और बाद में काला हो जाता है, जिन पर छोटे-छोटे काले बिखरे हुए पेरीथीसियम बनते है ।

नियंत्रण
दोदान आदि (१९९४) ने बावस्टीन द्वारा बीज उपचार (. प्रतिशत घोल में ३६ घंटे बीज भिगोने) को बकाने के नियंत्रण के लिए अत्याधिक प्रभावकारी (८१. प्रतिशत नियंत्रण) पाया, इन्होंने तरावडी बासमती किस्म पर उपलब्ध सात कवकनाशियों को परखा था, जिनमें उक्त उपचार सर्वोत्तम पाया गया कुराओं (१९८१) ने .% सेरेसान के घोल में ४८ घंटे तथा इसके .% घोल में ३६ घंटे बीज भिगोने पर तलगलन रोग का पूर्ण नियंत्रण पाया रोगग्रस्त क्षेत्रों में निम्न उपाय अपनायेः

  • सेरेसान अथवा बावस्टीन के ०.१ प्रतिशत घोल में बीज को ३६ घंटे भिगोयें तथा बाद में बिजाई से पूर्व अंकुरित करें । 
  • एमीसान (Emisan) ५० ग्राम एवं १०० ली. पानी में १ क्विंटल बीज को २४ घंटे भिगोयें तथा अंकुरित होने पर बिजाई करें, इससे ९६ से १०० प्रतिशत तक नियंत्रण हो जाता है । 
  • रोपाई के समय रोगग्रस्त पौधों को न रोपें और उन्हें अलग कर दें ।
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