पर्णच्छद गलन (Sheath rot)
कारक जीव : एक्रो सिलीड्रयम ओराइजी (Acrocylindrium oryzae)
विवरण:
पर्णच्छद गलन सर्वप्रथम १९२२ में सवादा में ताइवान में रिकॉर्ड किया गया था. अब यह भारतीय उपमाहद्वीप में बहुत भी आम रोग हो गया है जो धान की फसल को नुकसान पहुंचता है. इस रोग का कारक जीव कवक बाहरी तथा भीतरी बिज की दोनों सतहों पर होते है. खरपतवार एचिनोक्लोवा कोलोना इस रोग का वैकल्पिक होस्ट होता है. इस रोग के लिए २०-३० डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान, उच्च वर्षा, आद्रता तथा ठंडी रात एंव नत्रजन ली अधिक मात्रा इत्यादि परस्थितिया इसके लिए अनुकूल होती है.
लक्षण:
कवक मुख्यतः उपरी पर्णच्छद को नुकसान पहुचाता है तथा नयी बालियों को बनने से रोकता है . भूरे धब्बे भी पर्णच्छद तथा कल्लो पर पाए जाते है . शुरुआत में धब्बे अनियमित ०.५-१.५ सेमी लम्बे किनारे पर भूरे जो की बाद में बड़े तथा पुरे पर्णच्छद पर फ़ैल जताए है. जब ऊपर के पर्णच्छद इससे पूर्णत प्रभावित हो जाते है तब बालिया या तो निकलती नहीं है यदि निकलती है तो दाने नहीं बनते है.
नियंत्रण:
- प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करे जैसे तणुकन , रामतुलसी, मंसूरी विष्णुभोग तथा कालानमक इत्यादि
- नत्रजन का प्रयोग तिन बार करना चाहिए इसके अलावा पोटैसियम का प्रयोग दो बार करना चाहिए
- बेनलेट द्वारा बीज उपचार करना चाहिए
- कवकनासी बेनलेट तथा डेकोनिल की ०.२ % मात्रा का १० दिन के अंतर पर छिडकाव करे.
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