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भूरी चित्ती (Brown Spot)

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भूरी चित्ती (Brown Spot)

कारक:  हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराईज़ी (Helminthosporium oryzae, Breda de Haan) 

विवरण: यह रोग पौधे के जीवन की सभी अवस्थाओं पर संक्रमण करता है पोटाश का असंतुलन अथवा कमी वाले क्षेत्रों, क्षारीय भूमियों तथा नाइट्रोजन के निम्न स्तर पर पौधों में रोग-ग्राहिता बढ़ जाती है कवक-जाल तथा कोनिडियम दोनों ही प्रतिकूल अवस्था में काफी दिनों तक जीवित रह सकते हैं अतः कवक रोगी-पौधों के अवशेषों एवं बीजों पर जीवित रहता है कोनिडियम के दोनों ओर से जनन नलिका (Germ Tube) निकलती है, जिसमें से पुनः एक पतली संक्रमण नलिका निकलती है, जो सीधे उप त्वचा (Cuticle) तथा बाह्यः त्वचा (Epidermis) को बेधती है जनन नलिका सीधे रध्रों द्वारा भी पत्तियों में प्रविष्ट हो सकती है तथा २४ घंटे के अन्दर लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं  

लक्षण:
रोग के लक्षण प्राकुर-चोल (Coleoptile), पत्तियों, पर्णच्छद तथा तूष (Glumes) पर पाए जाते हैं धब्बा, छोटा, भूरा तथा गोलाई लिए होता है यह बहुत छोटी बिंदी से लेकर गोल आंख के आकार का गाढ़ा भूरा या बैंगनी-भूरा होता है परन्तु बीच का भाग पीलापन लिए गंदा सफेद धूसर रंग का होता है धब्बे आपस में मिलाकर बड़े हो जाते हैं तथा पत्तियों को सुखा देते हैं उग्र सक्रमण में बालियाँ बाहर नहीं निकल पाती

          

 

        

नियंत्रण
अखिल भारतीय समन्वित धान सुधार परियोजना के अंर्तगत विभिन्न क्षेत्रों पर परीक्षण के बाद निम्न प्रायोगिक सन्ततियों को रोग रोधी पाया गया हैः 
संभ्रांत संतति               पितृगण

IET 13171                    IET 7613/VL 12

IET 13621                    Heera/Lakhi

IET 13712                    Saket/UPR 759-20-17

IET 13619                    Tulasi/ARC 10372

इनमें से एक या एक से अधिक सन्ततियों की अन्य गुणों में उपयुक्त पाए जाने पर रोग ग्रस्त क्षेत्रों में उगाने हेतु संस्तुती की जा सकती हैं इसके अतिरिक्त किस्म जी एस ५३१, मोंरगक्यान (Morangkayan) ,सुव्योन (Suwean339), ताईचुन सेन (Taichung Sen), अकियुडाका (Akiyudaka), टी-टीप (Te tep), शिमोकिटा (Shimokita) एवं आई.आर.६४ को संकरण कार्य में रोग निरोधक दाता के रूप में प्रजनन कार्य हेतु उपयोग किया जा सकता है (डी.आर.आर. १९९५ए) कौर आदि (१९७९) ने पाया कि मैग्नीशियम सल्फेट का १० पी.पी.एम. और फैरिक क्लोराइड का . पी.पी.एम. घोल से जड़ों के उपचार करने पर भूरी चित्ती रोग के संक्रमण में सार्थक गिरावट होती है रोग नियंत्रण हेतु सुझाव निम्न हैः

  • क्षेत्र के अनुसार रोग रोधी किस्मों का चुनाव करें  

  • बीज जनित संक्रमण रोकने हेतु . ग्राम कवकनाशी (सरेसान या एग्रोसान या थिरम) से प्रति कि.ग्रा. बीज उपचारित करें  

  • जहाँ रोग प्रतिवर्ष उग्र रूप में प्रकट होता है वहाँ रोपाई के - सप्ताह बाद से आरम्भ कर प्रत्येक १२-१५ दिन के अंतर में .२५ प्रतिशत जिनेब अथवा डाईथेन एम ४५ के - छिड़काव करें। 

  • संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें  

  • कवकग्रसित पौधों के अवशेषों एवं वैकल्पिक आश्रयदाता घासो को नष्ट करें

 

 

 

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