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- उपज
- पैकिंग
- भण्डारण
उपज - पूर्ण विकसित लीची के वृक्ष पर औसतन 80-150 कि.ग्रा. फल/वृक्ष/ वर्ष लगता है जो उगाए गए कल्टीवार, जलवायु- दशाओं और फलोद्यान प्रबन्ध पर निर्भर होता है।
भण्डारण - तुड़ाई के बाद लीची के फल तेजी से खराब हो जाते हैं। 20-300 से0 के परिवेश तापमान पर यह अपना चमकीला लाल रंग खो देता है और फलभित्ति तुड़ाई के 24 घंटे के भीतर भूरी होनी प्रारंभ हो जाती है। इसके अतिरिक्त, लीची की तुड़ाई में मौसम अधिक छोटा होता है और यह मुश्किल से मई से जून अन्त तक के बीच एक महीना होता है। गुणवत्ता बनाए रखने और अति-आपूर्ति की विधियों से बचने के लिए फलों का भण्डारण उचित ढंग से करना चाहिए। फल की गुणवत्ता बनाए रखने में प्रशीतन और नमी प्रतिरोधी पैकिंग में सहायता करते हैं। 30-40 से0 और 80 से 85 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता पर फलों को सामान्य दशाओं में 4 सप्ताह तक भण्डारित किया जा सकता है। गंधक उपचार द्वारा लीची का भण्डारण काल बढाया जा सकता है।
पैकिंग - अन्य कारकों के अतिरिक्त दूरवर्ती स्थानों तक विपणन के लिए परिवहन के दौरान ताजगी एवं गुणवत्ता बनाए रखने और फल क्षय रोकने में फलों की समुचित पैकिंग भी महत्वपूर्ण है। अत: बाजार तक फलों को भेजने से पहले इन्हें उचित ढंग से पैक करना चाहिए। लीची के फलों की पैकिंग में दो महत्वपूर्ण आवश्यकताएं होती है :
- फलों को पात्र में खुला नहीं रखना चाहिए, और
- इसमें वायु स्वतंत्रतापूर्वक परिसंचरित होना चाहिए। भारत में इसे सामान्यत: छोटी बाँस की टोकरियों, सी0एफ0बी0 या लकड़ी के टोकरों (क्रेट) में पैक किया जाता है।
पैकिंग से पहले क्षतिग्रस्त, धूप से झुलसे एवं चिटके हुए फलों को छाँट कर आकार के अनुसार फलों को श्रेणीकृत करना चाहिए। एक पेटी में केवल एक श्रेणी के फल होने चाहिए। एक किस्म के फलों को पृथक्-पृथक् पेटियों में पैक करना चाहिए। और यह अच्छा होता है, यदि पात्र (पेटी, टोकरी आदि) पर किस्म के नाम एवं श्रेणी का टैग लगाया जाए।
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