लीची की उत्पादन प्रौद्योगिकी -
गोबर की खाद/ पोषक एक वर्ष के वृक्ष पूर्ण उत्पादन (10 वें वर्ष से आगे)
गोबर की खाद 10 कि.ग्रा. 100 कि.ग्रा.
नाइट्रोजन 100 ग्राम 1000 कि.ग्रा.
फॉस्फोरस 50 ग्राम 500 ग्राम
पोटाश 60 ग्राम 600 ग्राम
नाइट्रोजन दो विभाजित मात्राओं में प्रयोग करना चाहिए -
(क) तुड़ाई के बाद 2/3 मात्रा
(ख) फल लगने के बाद 1/3 मात्रा
पोटाश दो भागों में प्रयोग करना चाहिए -
(क) तुड़ाई के बाद 1/2 मात्रा
(ख) फल लगने के बाद 1/2 मात्रा
गोबर की खाद, फॉस्फोरस की पूरी मात्रा तुड़ाई के बाद प्रयोग करना चाहिए।
अनिवार्य पादप पोषक - नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, कैल्सियम, लोहा, बोरॉन, जस्ता, मॉलिब्डेनम।
आई0पी0एन0एम0 - वृध्दि एवं विकास के लिए वर्मीकम्पोस्ट, कुक्कुट खाद, जैव उर्वरक, गोबर की खाद, वर्मीवाश, नीम की खली एवं पलवारथा है। रोपाई के लगभग 1 वर्ष बाद उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। इनका प्रयोग अधिक हल्का होना चाहिए और उन्हें समान रूप से बिखेरना चाहिए परन्तु उर्वरक को वृक्षों के तने को नहीं छूना चाहिए। उर्वरक प्रयोग के बाद सिंचाई करनी चाहिए।
10 वर्ष के वृक्षों में उर्वरक तना से 1-1.5 मीटर दूर या वृक्ष के विस्तार के अनुसार प्रयोग करना चाहिए। फॉस्फोरस एवं पोटाश मृदा पृष्ठ के 15-30 से.मी. नीचे डालना चाहिए।
2- गङ्ढों की तैयारी - मई के महीने में एक घन मीटर (1मी03) आकार के गङ्ढे खोदे जाते हैं। खुदाई के 155 दिनों के बाद गङ्ढों में गोबर की खाद (20-25 कि.ग्रा.), सिंगल सुपर फास्फेट (1 कि.ग्रा.) एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश (500 ग्राम) के साथ ऊपरी मृदा का मिश्रण भरा जाता है। भराई के बाद गङ्ढों में तत्काल पानी डाला जाता है ।
रोपाई दूरी : 10x10 मीटर पौधे से पौधे के बीच दूरी
रोपाई संख्या : जून-जुलाई
3- जल प्रबन्ध - लीची की बागवानी के लिए खराब जल निकास वाली मृदा, अपारगम्य परतों से युक्त मृदा एवं मृदा के एक मीटर से नीचे की अपेक्षा कम उथली मृदा उपयुक्त नहीं होती है। यद्यपि बजरीदार या चट्टानी मृदा से अच्छी तरह से जल निकास हो जाता है परन्तु ये खराब जलधारण क्षमता के कारण वृक्षों के लिए पर्याप्त जल की पूर्ति नहीं करती हैं। अच्छी सिंचाई की पध्दतियाँ जैसे जल की थोड़ी मात्राओं से बारंबार मृदा को गीला बनाए रखना इन मृदाओं को लीची की बागवानी के लिए अधिक उपयुक्त बनाती हैं।
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