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मक्का मे पादप सुरक्षा एवं जल प्रबन्ध

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पादप सुरक्षा

      खरपतवार नियंत्रण-खरीफ ऋतु में अधिक वर्षा एवं तापमान होने के कारण मक्का की फसल में खरपतवारों की समस्या बढ जाती है। यदि उचित समय पर खरपतवार नियंत्रण नहीं किया गया तो समय पर खरपतवार नियंत्रण नही किया गया तो उपज में 50-60 प्रतिशत तक हानि हो जाती है। अत: खरपतवारों का नियंत्रण करना आवश्यक है। बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई तथा 40-45 दिन बाद दूसरी निराई-गुडाई करके खरपतवार नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त खरपतवारनाशी रसायनों का प्रयोग भी किया जा सकता है। जैसे के एट्राजिन अथवा सिमाजिन का 1.0 से 1025 कि0ग्रा0 सक्रिय अवयव या एलॉक्लोर (लासों) का 2.0-2.5 लीटर सक्रिय अवयव/है0 की दर से बुवाई के बाद प्रयोग करने पर खरपतवार नष्ट हो जाते है। पन्डीमेथालिन की 3.0-3.5 लीटर दवा/है0 की दर से बोने के तुरन्त बाद प्रयोग की जा सकती है।

जल प्रबन्ध

      मक्का मुख्यतया: वर्षा की फसल है इसलिए सामान्यतया मक्का में सिंचाई की आवश्यकता नही पडती है। खेत में नमी कम है या सूखाग्रस्त स्थिति होने पर मक्का की फसल को घुटने की ऊंचाई, नर मंजरी के निकलने, भुटटे में दाना भरते समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए अन्यथा पौधों की बढवार कम होगी और उपज कम हो जायेगी। यदि फसल अगेती है तब मानसून प्रारम्भ होने से पूर्व 2-3 सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। सामान्यतया: मक्का की फसल में सिंचाई उपलब्ध नमी की 50 प्रतिशत मात्रा कम होने पर की जाती है। खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था होना अति आवश्यक है अन्यथा जलभराव की स्थिति में फसल पर विपरीत प्रभाव पडता है।

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