धान के कीट एवं उनका प्रबंधन
धान की खेती कई विभिन्न पर्यावरण एवं फसल-चक्रों में की जाती है । सामान्यत: धान की उपज में क्षति के लिए ३३ प्रतिशत खरपतवार, २६ प्रतिशत बीमारियां, २० प्रतिशत कीट, ८ प्रतिशत चूहे, ३ प्रतिशत चिड़ियाँ एवं १० प्रतिशत अन्यजैसे नेमाटोड, परपोषी पौधे एवं माइट आदि उत्तरदायी हैं (नागराजन, १९९४) । अतः धान की उपज में स्थिरता लाने के प्रयत्नों में कीट भी प्रमुख रूप से बाधक है । विश्व में अनुमानित ९ करोड़ टन कीटनाशकों की मात्रा का लगभग १४ प्रतिशतकेवल धान फसल में उपयोग होता है । सम्भवतः फसल उत्पादकों के समक्ष आने वाली सम्पूर्ण कीट समस्याओं में धान की फसल को आक्रांत करने वाली कीट समस्यायें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । यही नहीं अपितु पिछले कुछ वर्षों में उत्पादनवृद्धि हेतु अपनाई गई आधुनिक विधियों जैसे सिंचाई एवं रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग के कारण समस्या और भी जटिल हो गई है । तथापि नये कीटनाशियों की उपलब्धता एवं कीट निरोधी किस्मों के विकास से काफी सीमा तकप्रभावकारी नियंत्रण संभव हो सका है । यहां भी कुछ कीटों की सक्रिय जीवन अवधि कीटनाशियों के अवशेषी प्रभाव की अवधि से अधिक होने के कारण थोड़ी उलझन हो जाती है । कीटनाशियों के अनियंत्रित एवं गलत उपयोग से कभी-कभीतो कीटों की संख्या उपचारित एवं अनुपचारित खेतों में एक समान हो जाती हैं इसलिए वांछित परिणाम पाने के लिए कीटनाशियों का बार-बार प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है । धान उत्पादन की बढ़ती लागत एवं कीट आयतन को ध्यानमें रखते हुए इस समस्या को हल करने के लिए ठोस प्रयोसों की आवश्यकता है ।
कीटों से होने वाली क्षति क्षेत्र विशेष, फसल-चक्र, उत्पादन तकनीक, निवेश स्तर आदि पर निर्भर करती है । यही नहीं अपितु धान की किस्म तथा अपनाए गये पौध सुरक्षा प्रबंध भी महत्वपूर्ण हैं । अन्तर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (इर्रि), मनीला में किए गए प्रयोगों के परिणामों से ज्ञात हुआ कि पौध सुरक्षा प्रदान करने पर ५.३ ट./है. धान की उपज प्राप्त हुई, जबकि उपचारहीन (बिना पौध सुरक्षा) स्थिति में २.९ ट./है. उपज ही प्राप्त हो सकी ( डे दत्ता, १९८१) । कलोडे (१९८७) ने अपने ९ वर्षो के अध्ययन में पाया कि बिना पौध सुरक्षा की तुलना में फसल को उचित पौध सुरक्षा देने पर धान की उपज में २१ प्रतिशत वृद्धि होती है । आपने यह भी अनुमानित किया कि धान की उपज में कीटों द्वारा खरीफ एवं रबी मेंक्रमशः ३१ एवं २७ प्रतिशत उपज में गिरावट होती है । अतः खरीफ के मौसम में अधिक हानि होती है । पाटिल आदि (१९९०) ने गुजरात में अध्ययन करते हुए पाया कि खरीफ मौसम में तना छेदक के आक्रमण से उपज में ५०.८ प्रतिशत तककमी आती है, जबकि ग्रीष्म ऋतु में यह कीट २६.६ प्रतिशत तक ही हानि पहुंचा पाता है ।
कभी-कभी किसी विशेष कीट से फसल की शत प्रतिशत तक हानि हो जाती है । ऐसे ही हरा तेला द्वारा वर्ष १९७३-७४ में केरल राज्य में ५०,००० हैक्टर क्षेत्र प्रभावित हुआ, जिसमें ८,०० हैक्टर क्षेत्र में फसल पूर्णतः बर्बाद हो गई, शेष में १० से ७०प्रतिशत तक हानि अनुमानित थी (कुल श्रेष्ठ आदि, १९७४) । इसी प्रकार १९७८ में मध्य प्रदेश के विलासपुर, दुर्ग तथा रायपुर में गालमक्खी (Gall midge) द्वारा उपज में सामान्यत ५० प्रतिशत हानि तथा कुछ खेतों में सम्पूर्ण फसल नष्टहोती देखी गई । वर्ष १९९५ में भूरे एवं सफेद पीठ वाला तेला से हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में शत प्रतिशत हानि पाई गई । ऐसी हानियाँ विशाल क्षेत्र में महामारी के रूप में कभी-कभी ही होती हैं, परन्तु छोटे स्तर पर ऐसी हानियां अक्सर होती हीरहती हैं । कीटों के प्रभावी नियंत्रण के लिए अनेक प्रकार के कारणों को प्रभावित करने वाले धारकों की जानकारी आवश्यक है जैसे उनके प्रकट होने का समय, जीवन चक्र, मौसम, उनकी आदतें और निवास स्थान विशेषकर विपरीत ऋतु मेंउनके द्वारा हानि पहुँचाने का ढंग तथा उस हानि का स्तर और प्रभावित होने वाली फसल की किस्में एवं उनकी अवधि इत्यदि, जिससे समय रहते उन पर नियंत्रण कर बढ़ती मांग की पूर्ति हेतु फसल का उत्पादन स्तर बनाए रखा जा सके ।
पाठक (१९६८) ने ७० कीटों को धान की फसल आंक्रात करते हुए पाया, जिनमें २० कीट आर्थिक महत्व के हैं अर्थात जिनसे पर्याप्त हानि की सम्भावना होती है । ये पौधे की विभिन्न अवस्थाओं में आक्रमण करते हैं और इनमें से कुछ रोगकारक वाइरस जीवाणु के वाहक का भी कार्य करते है । भारतवर्ष में कुछ मुख्य कीटों का प्रसार तंत्र चित्र -७९ के दर्शाया गया है, इससे ज्ञात होता है कि तना छेदक (Stem borer), पत्ती मोड़क (Leaf folder) एवं तेला व्यापक रूप से धान क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जबकि अन्य कीट क्षेत्र -विशेष की समस्याएं हैं ।
धान के मुख्य कीटों के लिए निश्चित आर्थिक प्रभाव सीमा स्तर (ETL)
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फसल की अवस्था एवं कीट |
आर्थिक प्रभाव सीमा स्तर |
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क. पौदशाला |
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ख.रोपाई से दौजी प्रारम्भ होना |
एक क्षतिग्रस्त पत्ती स्थान (हिल) |
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ग.दौजियां निकलने की अवधि |
एक से दो ताजी क्षतिग्रस्त पत्तियां स्थान |
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घ. पुष्प गुच्छ प्रारम्भ से परागण |
एक पतंगा या एक अंडा समूह/ मी.2 |
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ड़. परागण के बाद पकने तक |
१० कीट/ स्थान |
धान की फसल को नुकसान करने वाले मुख्य कीटों के जीवन -चक्र एवं उनकी आदतो के सम्बंध में जानकारी तथा इनसे फसल को बचाने के लिए अर्थात कीट प्रबंध हेतु उपाय सुझाए गये हैं ।
[[भूरा तेला]]
[[हरा तेला]]
[[सफेद पीठ वाला तेला]]
[[तना छेदक]]
[[पत्ती मोड़क]]
[[सफेद मक्खी]]
[[गाल मक्खी]]
[[गंधी कीट]]
[[जड़ की सूंड़ी]]
[[हिस्पा]]
[[कटवा सूंडी]]
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