| आभासी कांगियारी (False Smut) |
| कारक: अष्टिलेजिनांइडिया वाइरेन्स (Ustilaginoidea virens (Cke.)Tok.) |
| विवरण: सर्वप्रथम दक्षिण भारत में वर्ष १८७८ में यह रोग पाया गया था । यह समुद्र के किनारें तथा पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है, परन्तु बिहार, म.प्र. एवं उड़ीसा में भी देखा गया है । यह रोग अष्टिलेजिनांइडिया वाइरेन्स (Ustilaginoidea virens (Cke.)Tok.) नामक कवक द्वारा फैलता है । कोनिडियम पानी में अंकुरित होकर ऐमेरोबीजाणु (Amerospores) बनाते है । प्रत्येक पीली, हरी काली गांठ (कूटरूप, Pseudomorph) पर १ से ३ वास्तविक रक्लेरोशिया बनते हैं जो पहले कोनिडियम के ढेर से ढ़के रहते हैं, परन्तु जब कोनिडियम का प्रकीर्णन हो जाता है, तब ये स्पष्ट दिखाई देते हैं, और आसानी से मिट्टी पर गिर जाते हैं, जिससे मिट्टी की ऊपरी सतह काली सी दीखती है । मुख्य रूप से यह मृदा-जनित पौध-रोग है । प्राथमिक निवेश द्रव्य ग्रीष्मातिजीवी कूटरूप से होता है । जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए द्वितीयक निवेश द्रव्य संक्रमण स्रोत का काम करते है । कोनिडियम के लिए अनुकूलतम तापमान २८ डिग्री से. तथा ९८ प्रतिशत आर्द्रता उपयुक्त है । अधिक वर्षा एवं नमी वाले वर्षो में यह रोग ज्यादा होता है । हिमाचल प्रदेश में परागण क्रिया के समय तापमान २४ से ३० डिग्री से. सापेक्ष आर्द्रता ९० प्रतिशत से अधिक तथा मेघाच्छादित आकाश हो, तब इस रोग के बढ़ने की सम्भावनाएं अधिक हो जाती है (सुधा आदि, १९९३) । अग्रवाल आदि (१९९०) ने रायपुर में अपने १९८५ से ८९ के अध्ययन में पाया कि फूल आने के समय वर्षा के दिनों का रोग की सघनता से सीधा घनात्मक सम्बन्ध है । इन्होंने यह भी पाया कि तापमान, आर्द्रता एवं वर्षा की मात्रा का रोग से सीधा सम्बंध नहीं हैं । दोदान एवं सिंह (१९९५) में आरम्भिक रोपाई (१० एवं २५ जून) में रोग प्रकोप की तीव्रता (Disease severity) १३.९ शए १७.६ अनुमानित की एवं रोपाई में देरी से रोग प्रकोप कम होते पाया, यहाँ तक कि १० अगस्त को ०.३ प्रतिशत ही रह गया । देर से रोपाई के कारण उपज में अन्यथा भारी गिरावट होती है, अतः इस गुण का लाभ फसल-उत्पादन में संभव नहीं है । आहुजा आदि (१९९४) ने पाया कि उर्वरा स्तर बढ़ाने पर रोग की सघनता बढ़ी है, साथ ही सीधे बिजाई की तुलना में रोपित धान में अपेक्षाकृत रोग अधिक होता ह। |
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लक्षण: रोग के लक्षण बालियों के निकलने के बाद ही दृष्टिगोचर होते हैं । रोग-ग्रस्त शूकिका (स्पाइकलेट) पहले पीले से लेकर संतरे के रंग का, बाद में जैतूनी-हरा हो जाता है, जो आकार में धान की सामान्य शूकिकाओं से दुगुना बड़ा होता है । कवक का यह हरा फलन कड़ा, आभासी मृदूतक (Pseudoparenchyma) से बना होता है, जो तीन बीजाणु युक्त (Sporiferous) सतहों से घिरा रहता है । जिसमें सबसे अंदर का सफेद पीला, बीच का केसरिया पीला तथा सबसे ऊपर जैतूनी काला होता है । इस प्रकार अधिक संख्या में बीजाणु चूर्ण रूप में होते हैं । यह बीजाणु -चूर्ण हवा द्वारा वितरित होकर स्वस्थ पुष्पो पर पहुंचते हैं और उन्हे संक्रमित करते हैं । बालियों में कुछ ही शूकिकाएं रोगग्रस्त होती, हैं । रोग-ग्रस्त शूकिका के ऊपर एवं नीचे के दानों के भार में भी कमी हो जाती है । |
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नियंत्रण: रोग-रोधी किस्में उगाना सर्वोत्तम उपचार है, परन्तु व्यापारिक स्तर की किसी भी किस्म में रोग-रोधिता नहीं पाई गई है । ढ़िडसा आदि (१९९०) ने किस्म पी.आर.१०३ में इस रोग से उपज में सापेक्षिक रूप से कम गिरावट पाई (सारणी १०.६) । इन्होंने यह भी पाया कि इससे कुछ पुष्प सीधे काली गोली बनकर प्रत्यक्ष रूप से तथा अन्य तने का भार कम होने पर अप्रत्यक्ष रूप से उपज में गिरावट का कारण होते हैं । सुघा आदि (१९९३) ने धान की ३४ किस्मों को परखा तथा पूसा एन.आर.७५०-२६, वी.आर. ४१२ एवं वी.आर. ५२४ पर रोग संक्रमणता का स्तर १ प्रतिशत अंकित किया, जबकि ४ अन्य किस्मों में ५ से २५ प्रतिशत रोग ग्राहित अंकित की गई । इस रोग के नियंत्रण हेतु निम्न उपाय सुझाए गए हैः
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