गाजर घास खत्म करें
राजीव कुमार गो0ब0पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पन्तनगर,
गाजर घास भारत में दूसरे देषों से आया हुआ एक खरपतवार है जिसका वैज्ञानिक नाम पारथेनियम हिस्टेरोफोरस है। इसे चटक चाँदनी, गंधी बूटी एवं पंधारी फूल आदि नाम से जाना जाता है। आज यह खरपतवार पूरे भारतवर्ष में एक महामारी के रूप में फैल चुका है। क्योंकि फसलों के साथ-साथ ये मनुष्यों और जानवरों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुचाता है, इसलिये इसके प्रकोप एवं प्रबन्घन के बारे में जानकारी अति आवष्यक है।
कैसे पहचाने
हर प्रकार के वातावरण में उगने की अभूतपूर्व क्षमता वाली गाजर घास एक षाकीय पौधा है जो 90 सें0मी0 से 1.0 मी0 ऊँचा होता है। इसकी पत्तियां गाजर या गुलदाउदी की पत्तियों की तरह होती हैं। पौधे साल भर उगते हैं। फूल सफेद रंग के छोटे-छोटे तथा शाखाओं के शीर्ष पर लगते हैं। फूल और बीज पौधों पर हर मौसम में आते हैं। प्रत्येक पौधा पांच हजार से पच्चीस हजार की संख्या में बीज प्रतिवर्ष पैदा कर सकता है।
कैसे फैलती है
गाजर घास का फैलाव मुख्यत: इसके बीजों द्वारा होता है जो खाद सिंचाई के पानी, हवा तथा वाहनों एवं रेल गाड़ियों द्वारा एक के स्थान से दूसरें स्थान पर चले जाते है। यह घास मुख्यत: खुले स्थानों, औद्यौगिक क्षेत्रों, सड़कों तथा रेलवे लाइन के किनारे, अकृषित भूमि तथा मनुष्य के निवास स्थान के पास पायी जाती हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवेश पर इसके कुप्रभाव
पार्थीनियम की वजह से मनुष्य में तरह-तरह के चर्म रोग हो जाते हैं। पौधों के सम्पर्क में आने से खाज-खुजली होती है तथा गर्दन, चेहरे तथा बाहों की चमड़ी सख्त होकर फट जाती है और उसमें घाव बन जाते हैं। सम्पर्क लगातार बने रहने पर शरीर की चमड़ी के ऊपर एक्जीमा की तरह प्रभाव पड़ता है। पौधे पर सर्वत्र घने रोएं पाए जाते हैं जो तेज हवा के चलने पर, पौधों के आपस में रगड़ने से टूट कर हवा के साथ उड़ते हैं। इसलिए जो लोग इस खरपतवार के सीधे सम्पर्क में नहीं आते हैं उन्हे भी चर्म रोग हो सकता है क्योंकि वातावरण में इसके रोएं उड़ते रहते हैं।
चर्म रोग के अतिरिक्त पार्थीनियम के कारण श्वांस सम्बन्धी बीमारियां जैसे दमा (अस्थमा), हे फीवर आदि भी होती है। ये बीमारियां पार्थीनियम के फूलों, बीजों तथा पौधों पर उपस्थित रोएं के कारण होती है। फूलों में परागकण बहुत बड़ी मात्रा में बनते हैं, जो हवा के साथ दूर-दूर तक फैल सकते हैं। ये परागकण फेफड़ों, नाक तथा ऑंखों को प्रभावित करते हैं तथा ज्वर एवं अस्थमा जैसे रोग पैदा करते हैं। पार्थीनियम के दुष्परिणाम इनके पौधों में उपस्थित पार्थीनिन नामक रसायन के कारण होते हैं। ये रसायन मनुष्यों के तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) को प्रभावित करके डिप्रेषन की बीमारी पैदा करता है। जानवरों में भी यह खरपतवार कई रोग फैला देता है। इसकी उपस्थिति के कारण स्थानीय वनस्पतियां नही उग पाती है। जिससे स्थानीय जैव विविधता पर प्रभाव पड़ता है और पर्यावरण को नुकसान पहुचता है। कृषित भूमि में भी इसका प्रकोप बढ़ रहा है।
प्रबंधन
इसके नियंत्रण हेतु विभिन्न फसलों में रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन इस अवस्था पर उचित होगा कि इस खरपतवार को फूल आने से पहले ही निकाल कर नष्ट कर दिया जाय जिससे फसलों में इसका फैलाव न हो सके।
अकृषित भूमि में इसके नियंत्रण हेतु सामुदायिक रूप से प्रयास करना होगा जिसमें यांत्रिक विधि, जैविक विधि एवं रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त प्रतिस्पर्धात्मक पौधों द्वारा इसकी वृध्दि एवं विकास को रोका जा सकता है।
यांत्रिक विधि
निवास स्थानों के आस-पास तथा क्यारियों में उगे पार्थीनियम के पौधों को फूल आने से पहले समूल से उखाड़कर नष्ट कर दें। इसके गिने-चुने पौधे हों तो उन्हे हाथ से उखाड़ा जा सकता है। ज्यादा क्षेत्र पर इन्हें हाथ से उखाड़ना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है अत: इस परिस्थिति में यांत्रिक विधि से नष्ट करना चाहिए। हाथ से उखाड़ते समय ध्यान रखना चाहिए कि पौधे का शरीर से सीधा सम्पर्क न हो। इसके लिए हाथों में रबड़ के दस्ताने पहने या पालीथीन की थैलियां लपेटी जा सकती हैं। पौधें के जड़ से न उखड़ने या दराती आदि से काटने पर ये पुन: तेजी से बढ़ते हैं और इनमें बहुत सारी टहनियां निकलती हैं, जिसके कारण इनकी पुनवृद्वि पहले से अधिक हो जाती है। अत: इन्हें समूल नष्ट करना चाहिए।
रासायनिक नियंत्रण
शुरू की अवस्था में जब पौधे 2-3 पत्तियों के हों, इस खरपतवार को विभिन्न शाकनाषियों जैसे 2, 4-डी 0.5 किग्रा0 अथवा मेैट्रीव्यूजीन 0.35-0.4 किग्रा0 अथवा ग्लाइफोसेट 1-1.25 किग्रा0 सक्रिय अवयव को 600-800 लीटर पानी में घोल बनाकर अथवा सादा नमक 8-10 किग्रा0 100 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर इसको नष्ट किया जा सकता है। छिड़काव करते समय पौधों को घोल से अच्छी तरह भिगोना आवष्यक होता है।
जैविक नियंत्रण
पार्थीनियम का जैविक नियंत्रण मैक्सीकन बीटल (जाइगोग्रामा बाईकोलोरेटा) द्वारा भी किया जा सकता है। एक वयस्क बीटल एक पार्थीनियम के पूर्ण पौधे को 6 से 8 सप्ताह में खा जाता है। इस बीटल में प्रजनन की अद्भुत क्षमता होती है। एक स्थान पर जहाँ पार्थीनियम अच्छी मात्रा में हो कम से कम 500-1000 तक वयस्क बीटल छोड़ने चाहिए। एक स्थान पर इसे समाप्त करने के बाद बीटल पास वाले क्षेत्रों में उगे हुए पार्थीनियम पर आकर्षित होकर स्वत: ही चले जाते हैं। अत: एक बड़े क्षेत्र में कई जगह निर्धारित कर अलग-अलग बीटल छोड़ने पर उनका प्रसार तेजी से होगा। यह बीटल केवल पार्थीनियम को ही खाता है।
प्रतिस्पर्धात्मक पौधों द्वारा नियंत्रण
अकृषित क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक पौधों जैसे चकौड़ा (केसिया सिरेरिया एवं केसिया तोरा) एवं लटजीरा (एकाइरैन्थस आस्पेरा) द्वारा इसकी वृध्दि एवं विकास को रोका जा सकता है। घर के आस-पास एवं संरक्षित क्षेत्रों में गेंदे के पौधें लगाना चाहिए। कृषित क्षेत्रों में शीघ्र बढ़ने वाली फसलें जैसे ढैंचा, ज्वार, बाजरा आदि की फसलें लेकर इस खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है। पार्थीनियम के दुष्प्रभावों से मुक्त रहने के लिए समूहिक प्रयास से इसका प्रबंधन करना आवष्यक है।
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