ग्वार शुष्क क्षेत्रों के लिए एक पौष्टिक एवं फलीदार चारे की फसल है। यह प्रायः ज्वार या बाजरे के साथ मिलाकर बोया जाता है। इसमें प्रोटीन १३-१५ प्रतिशत पाई जाती है।
बलुई, दोमट भूमि, जिसमें पानी न भरता हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त है।
टाइप-२, एफ.एस.-२७७ एवं एच.एफ.जी.-११९, एच.एफ.जी.-१५६ बुन्देल ग्वार-१ (आई.जी.एफ.आर.आई.-२१२-९), बुन्देल ग्वार-२, आई.जी.एफ.आई.-२ मुख्य है।
२ या ३ जुताइयां देशी हल से करके मिट्टी भुरीभुरी बना लेना चाहिये।
बुवाई का समय: प्रथम मानसून के बाद जून या जुलाई में इसकी बुवाई करनी चाहिये।बीज दर: शुद्घ फसल के लिए ४०-४५ किग्रा. बीज प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिये। मिलावां फसल में बीज की मात्रा १५-१६ क्रिग्रा. प्रति हे. रखी जाती है।बुवाई की विधि: बुवाई छिटकवा विधि से की जा सकती है परन्तु मिलवॉ खेती में लाइनों में हल के पीद्दे बुवाई करना अच्द्दा रहता है।
१५-२० किग्रा. नत्रजन तथा ४०-४५ किग्रा. फास्फोरस प्रति हे. की दर से प्रयोग करने पर अच्द्दी उपज प्राप्त होती है।
प्रायः फसल को सिचाई की आवश्यकता नही पड़ती है।
ग्वार की कटाई पुष्पावस्था (बुवाई के २ माह बाद) या फली बनने की अवस्था में करना चाहियें।
हरे चारे की औसत उपज १५०-२२५ कु. प्रति हे.है।
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Hemant Sharma
A User from Hanumangarh, Rajasthan,India
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