|
जीवाणु पत्ती अंगमारी (Bacterial Leaf Blight) |
|
|
कारक: जैन्थोमोनास ओराइज़ी (Xanthomonas oryzae pv. oryzae(Xoo) विवरण:इस रोग से भारतवर्ष में ६ से ६० प्रतिशत तक की उपज में गिरावट अनुमानित की गई है । यदि रोग फसल में देर से लगता है, तब उपज पर कम प्रभाव पड़ता है, परन्तु प्रारम्भ में ही संक्रमण हो जाने से १०० प्रतिशत तक उपज में गिरावट हो जाती है । श्रीवास्तव एवं राव (१९९३) ने बिहार के शाहबाद क्षेत्र में इस रोग का फैलाव महामारी के रूप में पाया । रोगजनक जीवाणु (बेक्टीरिया) पौधों की जड़ तथा तने के पास घास के द्वारा पत्तियों में रंध्रो द्वारा प्रविष्ट होता है और संवहन तंत्र के भीतर बढ़ता है, इसलिए रोग के लक्षण प्रायः पत्तियों के ऊपरी भाग से आरम्भ होते हैं । पत्तियों पर जीवाणुज़ स्राव निकलता है, जो द्वितीय निवेश (पुनः संक्रमण कारक) द्रव्य का काम करता है । यह तेज वर्षा, सिंचाई के पानी तथा कीटों द्वारा तेजी से फैलता है । इसके लिए30o से. 350o से. तापमान उपयुक्त है । मृदा में नाइट्रोजन की अधिक मात्रा होने से रोग की उग्रता बढ़ती है (सिंह एवं मुदगल,१९७८ और देवदत्त, १९८७) । रोग के जीवाणु फसल के अवशेषों तथा खरपतवारों पर आश्रय लिए रहते हैं । |
|
|
लक्षण: |
|
|
नियंत्रण: संभ्रान्त संतति पितृगण़ इस कार्यक्रम से आई.आर.९८२८ तथा एच.के.८६-१ को प्रजनन कार्य के लिए अच्छे दाता के रूप में पहचान गया (डी.आर.आर., १९९५ बी) । सिंह एवं मोंगा (१९८५) ने कापर ऑक्सीक्लोराइड के पर्णीय छिड़काव से जीवाणुज़ अंगमारी नियंत्रण में आशाजनक परिणाम पाए । राजप्पन एवं सेखरन (१९९४) ने ०.३ प्रतिशत निकिल नाइट्रेट (Nickel Nitrate) के पर्णीय छिड़काव से जीवाणुज़ अंगमारी के प्रकोप में कमी पाई । रोग नियंत्रण हेतु अन्य उपाय निम्न प्रकार हैः
|
|
|
|
|
- 1232 reads
