जैव नियंत्रण:परजीवी अथवा परभक्षी कीट, माईट एवं फंगस आदि जैव साधनों द्वारा धान में सफल खरपतवार नियंत्रण हो सकता है, परन्तु एक समय में केवल एक खरपतवार-प्रजाति पर ही इनका प्रभाव होता है।इन जैविक साधनों की कार्य गति अक्सर धीमी होती है, जो ३० दिन से १० वर्ष तक आंकी गई है (नयार्को एवं डे दत्ता, १९९१)।धान के खेत में कई प्रकार के खरपतवार होते हैं, अतः किसान धान की खेती में जैव नियंत्रण समान्यतः नहीं कर पाते।रोपित धान में, टेडपोल श्रीम्प (Tadpole Shrimp, Triopus Spp.) एक विशेष खरपतवार नियंत्रक जापान में प्रदर्शित किया गया,परन्तु दुर्भाग्य से सीधी बिजाई वाले क्षेत्रों में यह फसल का शत्रु कीट बन गया।अजोला की मोटी चटाई भी खरपतवार की बढ़वार रोकने में उपयोगी सिद्ध हुई है । इसके रहने से रोपाई के ५० दिन बाद खरपवार के शुष्क भार में ७९ प्रतिशत कमी पाई गई ।अजोला की उपस्थिति से सूर्य प्रकाश एवं आक्सीजन का प्रवाह अवरूद्ध हो जाता है, जिससे खरपतवारों की बढ़वार में कमी आती है, परन्तु कुछ खरपतवार अजोला की चटाई को तोड़कर ऊपर आ जाते हैं।
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