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पपीता : मूलस्तम्भ संधि सड़न

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मूलस्तम्भ संधि सड़न (फूटराट):

यह पपीता का गंभीर रोग है। इस रोग के लक्षण जमीन के समीप के तने पर जलासिक्त धब्बे के रूप में प्रकट होता है यह धब्बे के रूप में प्रकट होता है यह धब्बे बढ़कर पूरे तने को चारो तरफ से घेर लेते हैं तथा ऊतकों को सड़ा देते है। जो गहरा भूरा या काले रंग का हो जाता है। रोगग्रस्त पौधे जमीन के सतह से टूटकर गिर जाते हैं तथा पौधा मर जाता है। कभी-कभी रोग का प्रकोप कम होने पर तने का एक ही तरफ का हिस्सा सड़ता होता है तथा पौधे की बढ़वार रूक जाती है। यदि फल बन गये है। तो वे सिकुड कर विकृत हो जाते हैं। धीर-धीरे पूरा पौधा मर जाता है।

 

            

 

 

प्रबन्धन :

  • इस रोग के प्रबन्ध के लिए जलनिकास की उचित व्यवस्था करनी चाहिए जिससे खेत में जल भराव न हो।
  • सिंचाई के लिए रिंग विधि का प्रयोग करना चाहिए। जिससे पानी तने के सम्पर्कन  में आए।
  • पौध रोपण के समय सड़ी हुई गोबर की खाद में ट्राइकोडरमा नामक जैवनियन्त्रक को मिलाकर 15 ग्राम/पौध की दर से प्रयोग करें।
  • खड़ी फसल में रोग का प्रकोप होने पर कापर आक्सीक्लोराइड (3 ग्राम/लीट) या कैप्टान(0.2%) का घोल बनाकर तने के पास डेचिंग करें। जून से अगस्त माह 10-15 दिन के अन्तराल पर नियमित रूप से प्रयोग करें।
  • आशिंक सड़न की दशा में सड़े हुए भाग को चाकू से छीलकर निकाल दें तथा बोर्डक्स पेस्ट का लेप करें।
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