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हिस्पा (Hispa) |
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वैज्ञानिक नाम : डिक्लाडिस्पा अर्मिगेरा ओलिव. (Dicladispa armigera Oliv.) |
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पहचान: युवा भृंग चमकदार नीला काला रंग लिए हुए ४.५ मि.मी. लम्बा तथा शरीर पर कांटे लिए होता है । ग्रब छोटी पीली सी होती है । मादा कीट औसतन ५५ अंडे पत्ती के शिखर की ओर कुछ-कुछ बाह्यः त्वचा के अंदर रखती है । तीन से पांच दिन कील हैचिंग (अंडे से लारवा बाहर आने की क्रिया) अवधि के बाद ग्रब पत्ती बाह्यः त्वचा में घुसती है, तथा अंदर खाती है और १४ दिन बाद प्यूपा में बदल जाती है । प्यूपा से युवा होने में ४ से ६ दिन लगते है । युवा नर एवं मादा कीट की जीवन अवधि क्रमशः १४ से २० दिन की होती है । |
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क्षति की प्रकृति: दोनों युवा एवं ग्रब धान के पौधों पर संक्रमण करते हैं । युवा पत्तियों का ऊपर से नीचे की ओर हरा भाग खाते है तथा शिरा विन्यास के साथ-साथ चलते हैं, जिससे सफेद समानान्तर रेखाएं बनती है । ग्रब पत्तियों की बाह्य त्वता में घुसकर अंदर खाते है तथा टैढ़े- मेढ़े चलते हैं । इससे पत्तियों पर सफेद खंड़ से दिखते हैं । अंत में पत्तियाँ सूख जाती हैं तथा पौधो की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है । हरियाणा में यह कीट कोई विशेष महत्व नहीं रखता, परन्तु वर्ष १९९८ के खरीफ मौसम में पछेती रोपी गई फसल में व्यापक रूप से हिस्पा का संक्रमण पाया गया । इसका प्रकोप बासमती किस्मों अपेक्षाकृत अधिक देखा गया. परन्तु विश्विद्यालय एवं कृषि विभाग की सतर्कता से त्वरित कदम बढ़ाने पर शूघ्रता से स्थिति नियन्त्रण में करना संभव हो सका । |
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नियंत्रण:
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