Submitted by deepalitewari on Fri, 20/11/2009 - 17:19
सब्जी मटर की प्रजातियाँ
- पुरातत्वीय प्रमाण आर्यो के आगमन से पूर्व भारत में मटर (पाइसम सैटाइवम) के अतिरिक्त सूचित करते है।
- यह मटर गोल और मिठास रहित दलहन प्रकार ( पा. सैटाइवम वैरा. आरर्वेन्स) था।
- यूरोप के शीतोष्ण क्षेत्रों में विकसित मीठे उद्यान मटर ( पा. सैटाइवम वैरा हार्टेंस) की प्रजातियां ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में प्रविष्ट हो सकती हैं।
- कठोर एवं गोल बीज वाले उद्यान मटर की कुछ प्रजातियां, जैसे बेनियां केव, असौजी आदि संमभवत: अग्रेजो के प्रारंम्भिक प्रवेश के साथ आई हो सकती हैं।
- ये अधिक गर्म दशाओं के अंतर्गत भी म्लानि रोग के प्रति कम संवेदनशील है और विभिन्न प्रजनन कार्यक्रमों के उनका उपयोग किया जाता रहा है।
विदेशी प्रजातियों का प्रवेश भारत में उद्यान मटर के प्रजनन का मुख्य आधार बनता है।
विदेश से प्राप्त इन प्रजातियों का या तो सही रूप में प्रजातियों (किस्मों) के समान उपयोग किया गया है। या नई प्रजातियां विकसित करने के लिए संयोजन प्रजनन कार्यक्रमों में उपयोग किया गया है। परिपक्वता अवधि के अनुसार दो समूहों, जैसे अगेती एवं मध्य मौसमी प्रजातियों के अतर्गत प्रजातियां (किस्मों) का वर्णन किया गया है।
खाद्य फलीदार प्रजाति (स्नो पी या सुगर पी या स्नैप पी)
इस प्रकार की पूरी फलियाँ खाई जा सकती है क्योंकि फली भित्तियों में कम रेशा एवं अधिक शर्करा होती है।
1. सिल्विया
- यह स्वीडन से उपस्थापित प्रजाति है।
- पौधे ऊँचे होते हैं। पहला पुष्पपुंज बोआई के 60 दिनों के बाद 14वीं से 16वीं गांठ पर प्रकट होता है।
- फलियाँ अकेली लगती हैं, ये पीली-सी, लम्बी (12 से0 मी0) एवं टेढ़ी और पार्चमेन्ट प्रकार की फलभित्ति से रहित होती हैं।
- फलियाँ मीठी होती हैं और देखने में मध्यम आकार के फ्रेंच बीच की फली के समान होती है।
2. यू एन 53 (3)
- यह प्रजाति आई आई एच0 आर0, बंगलौर में विकसित की थी जो 90 दिनों की फसल अवधि में 8-9 टन फली उपज प्रति हैक्टेयर देती है।
3. मीठी फली
- यह प्रजाति पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना द्वारा विकसित की गई है।
- पौधे बौने होते हैं तथा अच्छी हरी फली उपज देते हैं।
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