मध्यम - मौसमी किस्में
ये अधिक उपज देने वाली प्रजातियाँ (किस्में) 3 चुनाइयां देने में सक्षम होती हैं। पहली चुनाई बोआई के 80-90 दिनों के बाद और बाद की दो चुनाइयां 15 दिनों के अन्तराल पर की जाती है।
1. बोनविले
- यह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा खेती के लिए संस्तुत संयुक्त राज्य अमेरिका से उपस्थापित प्रजाति (किस्म) है।
- पौधा मध्यम ऊँचा (60 से0 मी0) होता है, पुष्प अधिकतर दो के गुच्छे में लगते है: फलियाँ हल्के हरे रंग की सीधी, बड़ी (9 से0 मी0) और 6-7 अच्छी तरह से भरे हुए, मीठे, मोटे एवं झुर्रीदार बीजों से युक्त होती हैं।
- यह प्रजाति प्रथम पुष्पन के लिए 65 - 70 दिन लेती है। 13-15 वीं गॉठ पर लगते हैं।
- यह 45 प्रतिशत दानों के साथ 9 टन प्रति हैक्टेयर की औसत फली उपज देती है।
2. आल्डरमैन
- यह संयुक्त राज्य अमेरिका से उपस्थापित (लाई गई) प्रजाति है।
- पौधे ऊँचे (150 से0 मी0) होते है, फलियॉ लगभग सीधी बड़ी (9-10 से0 मी0) और 8-10 अधिक मीठे, चमकदार बीजों से युक्त अकेली लगती हैं।
- यह हिमीकरण प्रयोजन के लिए उत्तम कल्टीवार है।
3. परफेक्षन न्यूलाइन
- यह संयुक्त राज्य अमेरिका से उपस्थापित प्रजाति है।
- पौधा मध्यम ऊँचाई का एवं ओजपूर्ण होता हैं पुष्प दो के गुच्छे में लगते हैं, फलियाँ 8 से0 मी0 लम्बी, गहरे हरे रंग की और 6-7 हल्के हरे रंग के मीठे एवं झुर्रीदार बीजों से युक्त होती हैं।
- पहली चुनाई 85 दिनों के बाद प्रारम्भ होती है। अधिक उपज देने वाली प्रजाति है।
- औसत फली उपज 10 टन/हैक्टेयर है।
4. टी - 19
- यह मध्यम ऊँची एवं दो फलियों से युक्त प्रजाति कृषि विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा विकसित की गई है।
- बोआई के 60 दिनों के बाद 12-14 वीं गॉठ पर पहला पुष्प गुच्छ प्रकट होता है।
- फलियाँ पीताभ हरी, हल्की - सी मुड़ी हुई, 8.5 से0 मी0 लम्बी और 45 % दाना के साथ 6-7 झुर्रीदार बीजों से युक्त होती हैं।
5. लिंकन
- संयुक्त राज्य अमेरिका से उपस्थापित प्रजाति कटरियां पर जारी की गई थी।
- पौधे मध्यम उँचाई के होते है, और पहला पुष्पगुच्छ 11-12 वीं गॉठ पर प्रकट होता है।
- यह दो फली युक्त प्रजाति है। फलियाँ गहरे हरे रंग की मुड़ी हुई, बड़ी 8-9 से0 मी0 लम्बी है और 8-9 झुर्रीदार बीजों से युक्त होती है।
- पहली चुनाई बोआई के 85-90 दिनों के बाद प्रारम्भ होती है। यह डिब्बा बंद प्रयोजन के लिए अच्छी प्रजाति है।
- औसत फली उपज 10 टन/हैक्टेयर है।
6. एन पी 29
- भारतीय कृषि अनुसंधान पर वरण दूसरा यह अधिक उपज देने वाली झुर्रीदार बीजों वाली प्रजाति विकसित की गई थी।
- पौधे हरे पर्ण समूह युक्त मध्यम ऊँचाई के होते है।
- बोआई के 80 दिनों बाद 14-16 वीं गाँठ पर पहला पुष्पगुच्छ प्रकट होता है। फलियाँ दो के गुच्छों में, हरे रंग की, सीधी 7.5 से0 मी0 लम्बी और 6-7 बीजों सें युक्त होती हैं।
- फलियों से दाना निकलने का प्रतिशत 50 है।
- यह निर्जलीकरण प्रयोजन के लिए उपयुक्त है।
7. जवाहर मटर - 1 (जे एम 1 या जी सी 141)
- यह प्रजाति जबलपुर में टी - 19 ग्रेटर प्रोग्रेस के संकरण से उन्नत पीढ़ी वरणों द्वारा विकसित की गई थी।
- पौधे की ऊँचाई 65-70 से0 मी0 होती है और वह झुर्रीदार होता है, पर्ण समूह हरा, पुष्प सफेद और प्रत्येक कक्ष में दो पुष्प होते हैं।
- फलियाँ, सीधी, बड़ी (8.8 से0 मी0) और 8-9 बड़े, मीठे एंव झुर्रीदार बीजों से युक्त होती हैं।
- छिलका उतारने के बाद 52% दाना के साथ औसत फली उपज 10-12 टन/हैक्टेयर होती है।
8. जवाहर मटर 2 ( जे एम 2)
- यह प्रजाति जबलपुर में दो विदेशी वंशक्रमों ग्रेटर प्रोग्रेस x रशियन- 2 के संक्रमण से उन्नत पीढ़ी द्वारा विकसित की गई थी। फलियाँ गहरे हरे रंग की बड़ी, टेढ़ी और 8-10 मीठे बीजो से युक्त होती हैं।
- बीज झुर्रीदार हरे और आकार में अधिक बड़े होते हैं।
9. वी एल - मटर 3
- यह प्रजाति अल्मोड़ा में संकर ओल्ड सुगर x अर्ली रिंकल्ड ड्वार्फ 2-2-1 से वंशावली वरण द्वारा विकसित हुई थी।
- पौधे की ऊँचाई 67 से0 मी0 होती है, हल्के हरे रंग का पर्णसमूह होता है, पुष्प सफेद रंग के होते हैं, एक गुच्छे में दो फलियाँ लगती है। फलियाँ हलके हरे रंग की 6.8 से0 मी0 लम्बी, सीधी और 5 झुर्रीदार बीजों से युक्त होती हैं।
- चूर्णिल फफूँदी एवं म्लानि रोगों का सहिष्णु, पहली चुनाई बोआई के 100 दिनों के बाद प्रारम्भ होती है।
- छिलका उतारने के बाद 46% दाना के साथ औसत फली उपज 10 टन हैक्टेयर है।
10. पंत उपहार (आई0 पी0 - 3)
- यह प्रजाति पन्तनगर में वरण द्वारा विकसित की गई थी।
- पौधा हलके हरे रंग के अपेक्षाकृत पतले पर्णकों के साथ 70-75 से0 मी0 ऊँचा होता है, पुष्प सफेद रंग के होते है और प्रत्येक कक्ष पर दो कलिकाएं उत्पन्न होती है, फलियाँ गोल 7-8 से0 मी0 लम्बी और पीताभ एवं झुर्रीदार बीजों से युक्त होती हैं।
- बोआई के 75-80 दिन के बाद पहली चुनाई प्रारम्भ होती है।
- मटर तना मक्खी सहिष्णु होती है।
- छिलका उतारने के बाद 52% दाना के साथ औसत फली उपज 10 टन/हैक्टेयर होती है।
11. पंजाब 88 (पी - 88)
- यह प्रजाति लुधियाना में संकर पूसा0 2 X मोरे सिस - 55 के संकर संतति से वरणों द्वारा विकसित की गई थी।
- पौधे बौने, ओजपूर्ण गहरे हरे हरे रंग के पर्णसमूह से युक्त और खड़े होते है। एक या दो पुष्प प्रति कक्ष होते हैं।
- बोआई के 75 दिनों के बाद पुष्पन और 100 दिनों के बाद पहली चुनाई प्रारम्भ होती है। फलियाँ गहरे हरे रंग की, लम्बी (8-10 से0मी0) और बीच में हलकी सी टेढ़ी और 7-8 हरे झुर्रीदार एवं कम मीठे बीजों से युक्त होती है।
- छिलका उतारने के बाद 47 प्रतिशत दाना के साथ औसत फली उपज 15 टन प्रति हैक्टेयर है।
12. आजाद पी - 2
- कल्याणपुर पर संकर बोनविले X 6587 से उन्नत पीढ़ी वरण द्वारा चूर्णिल फफूंदी प्रतिरोधी यह प्रजाति विकसित की गई थी।
- पौधे ऊँचे (130 - 150 से0 मी0) खड़े, हल्के हरे रंग के पर्णसमूह एवं सफेद पुष्पों से युक्त होते है। फलियाँ सफेद पुष्पों से युक्त होते हैं।
- फलियाँ मध्यम आकार की, हल्की हरी, सीधी चिकनी, दो के गुच्छे में उत्पन्न होती हैं और उनमें 6-7 झुर्रीदार एवं भूरे रंग के बीज होते है।
- 90-95 दिनों की फसल अवधि। औसत उपज 12 टन/ हैक्टेयर है।
13. विवेक - 6 (वी एल मटर - 6)
- यह प्रजाति अल्मोड़ा में पंत उपहार X पी एल मटर - 3 के संकरण और उसके बाद आगे की पीढ़ियों में परवर्ती वरण द्वारा विकसित की गई थी।
- पौधे बौने, ओजपूर्ण और गहरे हरे रंग के पर्ण समूह एवं सफेद फूलों से युक्त होते है।
- फलियाँ हलके हरे रंग की, सीधी, मध्यम आकार की (6-7 से0 मी0) होती है और वे हरिताभ (हरा-सा) सफेद के 6 अर्ध-झुर्रीदार बीजों से भरी हाती हैं।
- पहली चुनाई बोआई के 125-130 दिनों के बाद षुरू की जाती है।
- यह ठंड एवं आर्द्रता प्रतिबल की साधारण प्रतिरोधी होती है।
- औसत फली उपज 10-11 टन/हैक्टेयर है।
14. ऊटी - 1
- उदगमंडलम् पर प्राप्ति पी0 एस0 33 से शुद्ध वंशक्रम वरण द्वारा विकसित प्रजाति है।
- यह प्रजाति 90 दिन की फसल अवधि में 11.9 टन/ हैक्टेयर की उपज क्षमता रखने वाला बौना प्रकार है। यह सफेद मक्खी प्रतिरोधी है।
15. जवाहर - पी0 83 (जे0 पी0 83)
- यह चूर्णिल फफूंदी प्रतिरोधी प्रजाति जबलपुर में द्विसंकरण (जे. एम. आई. 1 X जे. पी. 829) X (45 सी. X जे0 पी0 501) के आगे की पीढ़ियों में वरण द्वारा विकसित की गई थी।
- पौधे बौने (50 से0 मी0) होते है, फलियाँ बड़ी एवं मुड़ी हुई और 8 बड़े, हरे एंव मीठे बीजों से युक्त होती है।
- औसत फली उपज 12-13 टन /हैक्टेयर है।
16. जवाहर पी 15 (जे. पी. 15)
- जबलपुर में त्रिसंकरण (जे. एम. आई. X आर. 98 बी.) X जे0 पी0 501 ए/2 से आगे की पीढ़ियों में वरणों द्वारा यह द्विप्रतिरोधी (चूर्णिल फफूंदी एंव फ्यूजेरियम म्लानि प्रतिरोधी) प्रजाति विकसित की गई थी।
- पौधे बौने (50 से0 मी0) होते है जो ठोस पोरियॉ रखते हैं।
- औसत फली उपज 13 टन / हैक्टेयर।
17. जवाहर मटर 54 (जे0 पी0 54)
- यह जबलपुर में द्विसंकरण (आर्किल x जे एम 5) x ( 4 बी0 सी0 x जे0 पी0 501) से उन्नत पीढ़ी वरण द्वारा विकसित चूर्णिल फफूंदी प्रतिरोधी प्रजाति है।
- पौधे बौने (45 - 50 से0 मी0) और ओजपूर्ण होते है।, फलियाँ बड़ी, संधि रेखाओं की ओर अंतर्वक्र (हँसियाकार) और 8-9 बड़े, झुर्रीदार हरिताभ - पीले रंग के बीजों से भरी होती है।
- औसत उपज 7 टन/हैक्टेयर हैं।
18. हिसार हरित (पी एच 1)
- यह मध्य - अगेती प्रजाति हिसार पर संकर बोने विले x पी 23 से वरण की स्थूल (वल्क) - वंशावली विधि द्वारा विकसित की गई थी।
- पौधे अर्ध - बौने होते है, पहली चुनाई बोआई के 60 दिनों के बाद प्रारम्भ की जाती है। एक से दो फलियाँ प्रति गुच्छ होती है, फली अच्छी तरह से भरी हुई, हंसियाकार, बड़ी एवं हरे रंग की होती है, बीज सूखने के बाद हरे गङ्ढेयुक्त होते है।
- औसत फली उपज 9 टन प्रति हैक्टेयर।
विकसित अन्य उन्नत प्रजातियां फैजाबाद से एन डी0 वी0 पी0 एवं एन डी0 वी0 पी0-10, अल्मोड़ा वी एल-8, लुधियाना से पंजाब 87, आई आई एच आर से अर्क अजीत (प्रतिरोधी वंशक्रमों के संकरण और उसके बाद बोन विले के साथ प्रतीप संकरण एवं उसके बाद वरणों द्वारा चूर्णिल फफूँदी एवं किट्ट प्रतिरोधी, आदि प्रजातियां है।
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