Submitted by deepalitewari on Sat, 21/11/2009 - 12:08
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मटर में जल प्रबन्ध
- मटर की फसल के लिए जल की आवश्यकता बहुत कम होती है परन्तु क्रान्तिक अवस्थाओं, जैसे बोआई पूर्व, पुष्पन और फली भराव एवं विकास अवस्थाओं के लिए जल आवश्यकता होती है।
- यदि मृदा हलकी एवं बलुई होती है तो अधिक बारंबार सिंचाइयां की जाती है।
- समुचित जलनिकास अनिवार्य होता है और यह सिंचाई कार्यक्रम के समान महत्वपूर्ण है।
- इसके अतिरिक्त, बोआई की विधि के आधार पर जल प्रबन्धन का वर्गीकरण किया जाता है।
समतल बोआई की गई फसल के लिए
- बोआई के समय पर खेत में आर्द्रता (नमी) की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए।
- बोआई - पूर्व सिंचाई अनिवार्य है यदि बोआई के समय पर मृदा में पर्याप्त आर्द्रता नहीं होती है।
- बोआई के ठीक बाद सिंचाई करने के बाद कठोर पपड़ी रचना पौधे के बाहर निकलने में बाधा के कारण खराब अंकुरण होता है।
- आवश्यकताओं के अनुसार पुष्पन एवं फली भराव अवस्थाओं पर दूसरी एवं तीसरी सिंचाईयों की संस्तुति की जाती है।
बोआई की खूड एवं क्यारी पध्दति
- अधिक बारंबार सिंचाई की आवश्यकता होती है।
- उस समय बोआई तत्काल बाद हल की सिंचाई की जाती है यदि आर्द्रता प्रतिबल अर्थात् नमी की कमी दिखाई देती है।
- पुष्पन एवं फली भराव अवस्थाओं पर दूसरी एंव तीसरी सिंचाई की संस्तुति की जाती है।
छिड़काव सिंचाई पध्दति
- यह पध्दति मटर की अगेती प्रजातियों के लिए उपयुक्त है।
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