वानस्पतिक विवरण
वर्धन अवस्थाएं
सी4 (C4) पौधा गन्ना के लिए सौर ऊर्जा को सर्वाधिक सक्षम परिवर्तन माना जाता है। इसकी चार वर्धन प्रावस्थाएं हाती हैं-
1. अंकुरण प्रावस्था
- जब व्यापारिक दृष्टी से गन्ने की रोपाई की जाती है तो गन्ना केवल तने के हिस्से (कलमों) या संपूर्ण तना द्वारा प्रवर्धित किया जाता है।
- केवल वरण कार्यक्रम में बीज प्रवर्धन किया जाता है।
- रोपण कलमों (सेटों) में कम-से-कम तीन कलिकाएं होनी चाहिए।
- उस समय अंकुरण प्रावस्था (शुरूआत 10% द्वारा और पूर्ण अवस्था 75% अंकुरण द्वारा सुस्पश्ट होती है) को व्यापारिक दृष्टी से उपयुक्त माना जाता है जब तने पर दो पत्तियाँ प्रकट हो जाती हैं।
2. दौजी निकलने की प्रावस्था
- उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में गन्ने की दोजियाँ निकलना पहला अंकुर प्रकट होने के बाद शीघ्र ही (लगभग 15-20 दिन में) प्रारंभ होता है।
- द्वितीयक अंकुर भूमिगत कलिकाओं से उत्पन्न होता है।
- गन्ने की जल्दी पकने वाली प्रजातियों में दोजियाँ 4-6 महीनों तक निकलती है और पंक्ति संपर्क (रो कान्टैक्ट) के बाद बंद हो जाती है।
- गन्ने की देरी से पकने वाली प्रजातियों में दोजियाँ निकलने का कार्य 6-8 महीनों तक चलता है।
- 2-4 दिनों में प्रत्येक नया अंकुर उत्पन्न होता है।
- गन्ने की खेती के अंतर्गत प्रत्येक पौधा विकसित करता है :
(क) विशाल झाड़ीदार प्रजातियों में 20-40 अंकुर
(ख) मध्यम झाड़ीदार प्रजातियों में 15-20 अंकुर
(ग) साप्ताहिक झाड़ीदार प्रजातियों में 8-12 अंकुर
3. बृहत् वृध्दि प्रावस्था
यह अवस्था 5 से 8 महीने तक चलती है। इस अवस्था पर गन्ना के पौधे सामान्यत: बढ़ते रहते हैं यदि उन्हें उचित ढंग से ऊष्मा एवं आर्द्रता की पूर्ति होती रहती है।
4. पूर्ण विकास एवं परिपक्वन
- यह प्रावस्था लगभग तीन महीने तक चलती है।
- इसकी परिपक्वता का निर्धारण तनों में एवं निश्चितसुक्रोस अंश (14-16% तक तना द्रव्यमान) और अपचायी शर्कराओ के निम्न स्तर द्वारा किया जाता है।
- सातवीं-आठवीं पोरियों एवं निचली पोरी से लिए गए रस के सूचकांकों के अनुपात (0.95-0.98) द्वारा बिल्कुल विश्वसनीय ढंग से तनों (वृंतों) के व्यापारिक परिपक्वन को पहचाना जा सकता है।
- उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कटाई समय तक गन्ने के तनों में औसतन 14-16 प्रतिशत तक शर्करा संचित हो जाती है और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में 8-12 प्रतिशत तक शर्करा संचित हो जाती है।
5. पुष्पन
1- गन्ना की व्यापारिक परिपक्वन अवस्था की समाप्ति पर पुष्पन प्रारंभ होता है।
2- इसके बाद तना (वृंत) में अंकुर काष्ठी भवन और शर्करा अंश की कमी हो जाती है।
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